‘रहिमन सिट साइलेंटली’ – 1

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शुभनीत कौशिक

बनारस के बारे में कुछ लोग जो एक रूमानी-सी तस्वीर अपने जेहन में संजोये रखते हैं, उसे काल्पनिक ही समझना चाहिए, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता, और अगर ऐसा होता है भी, तो इसे मात्र एक ‘संजोग’ (को-इन्सिडेंस) ही समझा जाना चाहिए.

तो साधो! अपने बनारस के बारे में बरसों से सुविज्ञ लेखकों द्वारा जुदा-जुदा भाषाओँ में गुरु-गंभीर लेखन कार्य होता रहा है. अगर आप अंग्रेजीदां हैं तो एम ए शेरिंग (‘बनारस द सेक्रेड सिटी ऑफ़ द हिन्दुस् इन एंशिएन्ट एंड मॉडर्न टाइम्स‘), डायना एल एक (‘बनारस द सिटी ऑफ़ लाइट‘), और के चन्द्रमौलि (‘फ्रॉम लुमिनस काशी टु वाइब्रेंट वाराणसी’) की गंभीर शोधपरक किताबें मौजूद हैं.

गुरु! हमें जो किताबें पसंद आती हैं वे हैं, विश्वनाथ मुखर्जी की ‘बना रहे बनारस‘ और काशीनाथ सिंह की ‘काशी का अस्सी‘, क्योंकि इनमें आपको झलक मिलती है उस बनारस की जो ‘आर्काइव्ज’ या लाइब्रेरी की मोटी जिल्द वाली, धूल फांकती किताबों में नहीं बंद है, बल्कि जो बनारसियों की रोजमर्रा की जिंदगी में पैबस्त है. पंजाबी के कवि ‘पाश’ की पंक्तियाँ हैं ‘…

भारत/ शब्द का अर्थ/ उन खेतों में दायर है/ जहाँ अन्न उगता है/ जहाँ सेंध लगती है’.

बनारस के बारे में यूँ ही कहूँ तो ‘… बनारस/ शब्द का अर्थ/ उन घाटों में दायर है/ जहाँ अड़ी जमती है/ जहाँ भंग छनती है’.

उन्नीसवीं सदी के बनारस के अप्रतिम लेखक भारतेंदु ने लिखा था, ‘ देखि तुमरि कासी संतो देखि तुमरि कासी’, जिसमें आगे वे काशी को आधा तो भांड, भड़ेरिया , बाभनों और संन्यासियों से भरा पाते है तो आधी काशी उन्हें रंडी, मुंडी, रांड, खानगी, खासी से भरी मिलती है.

प्रचलित कहावत है गुरु, अपने बनारस के बारे में ‘रांड सांड सीढ़ी संन्यासी/ इनसे बचे तो सेवै काशी’. तो इस दफे जेठ की धूप से तप- तपाये, चिलचिलाये बनारस की गलियों में तनिक हम भी सैर-सपाटा मार ही आये. तो बस उसी बनारसी जेठ की कुछ दुपहरियों का ब्यौरा यहाँ दे रहा हूँ.

बनारस से करीब नौ किमी दूर पांडेयपुर है, जो शहर का किनारा है, जहाँ शहर ख़त्म होता है और श्रीलाल शुक्ल के शब्दों में कहूँ तो, ‘जहाँ से भारतीय गाँवों का विशाल महासागर शुरू होता है’.

यहीं से ऑटो में बैठकर, धूल फांकते हुए ठेठ बनारस की ओर बढ़ लेते हैं ( सनद रहे, प्रकृति के सुकुमार कवि पन्त की पंक्तियाँ ‘खेतों में फैला है श्यामल/ धूल भरा मैला-सा आँचल/ भारत माता ग्रामवासिनी.) आजकल ऑटो चालक लोग परेशान हैं, कारण आर.टी.ओ. की चेकिंग चल रही है भाई! कई ‘फरमान’ अब तक जारी हो चुके हैं. मसलन, पहले की हरे-पीले रंगों से पुती हुई ऑटो को (जो आँखों को सुकून तो देती ही है, हरियाली फ़ैलाने के उद्यम में बरसों से लगे अपने सरकारी पर्यावरण एवं वन मंत्रालय का भी खासा सहयोग कर देती है.

गुरु आप तो वाकिफ ही हैं, कि अपनी लोकतान्त्रिक सरकार उसका भला चाहने/करने वालों को भला कब अपना समझती है), फिर से काला करने को कहा गया, ऑटो में सिर्फ चार सवारियों को ले जाने कि इजाज़त दी गयी (क्या मजाक है,भाई?). पर ऑटो चालक संघ ने फ़ौरन ही अपनी मीटिंग की, और अपना ‘फरमान’ जारी किया कि ‘सरकारी फरमान’ से कम हुई एक सवारी से होने वाले वित्तीय घाटे का निराकरण बाकी चार सवारियों से बढे हुए भाड़े लेकर किया जाये. और जैसा होना ही था, इस फरमान से जहाँ ऑटो और चालक को को राहत मिली, वहीँ सवारियों कि जेबें कुछ और हल्की हो गयी, जिसके एवज में सवारियों ने कभी ऑटो-चालकों को, तो किसी ने प्रदेश सरकार, और किसी ने मनमोहन सरकार को पानी-पानी पीकर कोसा.

तो गुरु! कुछ बनारस का हाल-चल होई जाये. बनारस विगत कुछ वर्षों से जवाहरलाल नेहरु नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन की चपेट में आ गया है, और बनारस की हालत पतली कर देने में वाराणसी विकास प्राधिकरण ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है, अतिक्रमण के चलते चौक-तिमुहानियाँ भारतीय बाघों की तरह गायब होती जा रहीं हैं. और सड़क का हाल तो किसी बनारसी से पूछियेगा नहीं तो क्लोरोमिंट का ‘दुबारा मत पूछना’ वाला हाल कर देगा और आप टापते रह जाइएगा. अब बनारस की सड़क और ट्रैफिक जामों के बारे में क्या कहूँ? कभी मीर ने दिल्ली के बारे में कहा था, ‘दिल्ली जो एक शहर था आलम में इन्तिखाब…’. वैसे ही कहूँ तो,

‘बनारस जो एक शहर है
ट्रैफिक से लबालब
मिलती है जहाँ सड़क
गड्ढों में कहीं-कहीं…’

अब देखिये गुरु! मैं यहाँ ‘जामों से लबालब’ भी कह सकता था, लेकिन कतिपय लोग जाम का अर्थ ट्रैफिक के सन्दर्भ में न लगाकर कहीं और लगाते. हालाँकि, भला हो जायसवाल जी का मधुशाला की दुनिया में भी अपना झंडा फहराए हुए हैं और ‘लिकर किंग’ पोंटी चड्ढा के इंतकाल के बाद कई अन्यों के साथ अपने मजबूत कन्धों पर मैखाने का साम्राज्य संभाले हुए हैं, जिससे अगर कोई ‘भोला भला मदिरालय जाने को निकले’ और ‘असमंजस में आ जाए ‘ तो वे एक रह पकड़ने को कह मदिरालय तक जरुर पहुंचा देंगे.

बड़ी- बड़ी योजनाओं के नाम पर इस पुराने शहर को खोद कर रख दिया गया है, ओवरब्रिज खड़े किये गए पर न सीवर की समस्या सुलझी है न जाम की. बनारसी भी इनसे तंग आ चुके हैं, ‘और का-का बने के हव भैया, अ कब ले बनी?’ ये सवाल पूछ-पूछकर आम बनारसी थक चुका है. अड़ी पर इन समस्याओं की रोज ही खबर ली जाती है पर अब अड़ी भी नए बनारसियों को कहाँ रुचती है, वे तो अक्सरहा नए खुले जे एच वी, आई पी माल में दीखते हैं. ग़ालिब ने दिल्ली और अपनी तंगी की ओर इशारा करते हुए लिखा था,

है अब इस मामूर में कहते गमे-उल्फत ‘असद’
हमने ये माना कि दिल्ली में रहें, खायेंगे क्या.

अब चूँकि खाने का सवाल बनारसी के लिए उतना अहम नहीं है जितना बनारस, अड़ी, भंग, पान, और महादेव हैं. अब अड़ी की कमी अड़ीबाजों को खलने लगी है इसलिए मैं तो कहूँगा,

है अब बनारस में अड़ीयों की कमी ‘कौशिक’
हमने ये माना कि काशी में रहें, जमायेंगे कहाँ.

साधो! यहाँ अड़ी ज़माने में आ रही दिक्कतों की ओर इशारा किया गया है. अड़ी के बारे में जानने के लिए ‘काशी का अस्सी’ पढ़ें. अड़ी वह जगह है जहाँ लोग-बाग़ तमाम मुद्दों पर अपने ख़यालात बातों, गालियों से जाहिर करते हैं, कभी-कभी नौसिखुओ में पिटा-पिटौवल भी हो जाता है. अब चर्चा के ये मुद्दे कुछ भी हो सकते हैं. मसलन बराक ओबामा, कृष्ण-सुदामा, वास्कोदीगामा या फिर किसी के मामा. बनारसी मानते हैं कि डॉक्टर की दवा और गंगा उस पार की हवा एक जैसा ही असर करती हैं. सो वे उधर हवा खाने और दिव्य निपटान करने जाया करते हैं. और पवित्र गंगा में ही गांड भी धो लेते हैं, बांये हाथ से ही. याद रखिये, कवि ‘धूमिल’ की ये पंक्तियाँ,

‘आदमी
दायें हाथ की नैतिकता से
इस कदर मजबूर होता है
कि तमाम उम्र गुज़र जाती है
मगर गांड
सिर्फ बांया हाथ धोता है…’

तो हम अब पहुँच गए हैं शहर के बीच में मौजूद एक लाइब्रेरी में, अब मालिक नाम में क्या रखा है? कुछ भी रख लीजिये, अपने स्वादानुसार. काम कि बात ये है कि हमारी अधिकांश लाइब्रेरी एक ही तरह की हुआ करती हैं, जो मानक भारतीय समय के अनुसार पूर्व-निर्धारित सुबह के दस बजे की बजाय ग्यारह बजे खुलती है, और शाम के पांच बजे की बजाय साढ़े-चार पर बंद हो जाया करती है.

इन लाइब्रेरियों में गाहे-बगाहे कुछ सीनियर सिटीजन (रिटायर होने के बाद घर में पड़े रहने से कलह बढ़ता है, इस सिद्धांत को मानकर, अख़बारों के एक-एक शब्द को पढ़ जाने के ज़ज्बे के साथ और दोपहर में कुर्सियों पर बैठे हुए एकाध झपकी लेने की अपनी ऑफिस वाली पुरानी आदत के मुताबिक), कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए ‘शूरमा भोपाली’, और कुछ अपन जैसे लोग पार्टनर!(जो बकौल, ‘रागदरबारी’ वाले रंगनाथ, ‘आजकल मक्खियाँ मार रहे हैं’ (दूसरे शब्दों में, कुछ ‘रिसर्च जैसा’ कर रहे हैं.) पहुँच जाया करते हैं.

गुरु! अगर आपको ‘जेनेरलाईजेसन’ न लगे तो मैं कहूँगा: ‘लाइब्रेरी एक पुरानी पीले रंग की बिल्डिंग हुआ करती है, जो अन्दर से कई सालों पहले चूना की हुई होती है. गोदरेज की कुछ शीशा लगी, कुछ लकड़ी की आलमारी और कुछ लकड़ी के रैक भी इसी इमारत अपनी-अपनी पोजीशन पर तैनात होते हैं.

छत-से कोई दो हाथ नीचे एक कतार में गाँधी, नेहरु, प्रेमचंद और किसी अन्य स्थानीय महापुरुष और लाइब्रेरी के संस्थापक की मढ़ाई हुई तस्वीरें लटकी होती हैं, जो माहौल को ज़रा ‘इमोसनल’ बनाती हैं. काफी ऊपर को उठी हुई छत, और उसमें लगे हुक के सहारे लटके हुए आदिम काल के पंखे, जो इस क्षणभंगुर संसार में अपने ‘सम्यक व्यायाम’ के चलते स्थित-प्रज्ञ हो चले होते हैं.

रीडिंग रूम में सागौन की लकड़ी से बने हुए चौपाये मेज (जिनकी स्थिरता पर कोई शंका करना, सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर उंगली उठाने जैसा है), जो अनादि-काल से उसी अवस्था में पड़े हुए हैं और बी आर चोपड़ा की ‘महाभारत’ के सूत्रधार के अंदाज़ में चाहें तो कह सकते हैं, ‘मैं समय हूँ!’.

एकसाथ लगाकर रखे हुए इन मेजों पर इक पुरानी मेजपोश पड़ी होती है, जो लाइब्रेरी की इज्ज़त ढकने के काम आती है, उस पर कहीं चाय तो कहीं तेल के दाग भी खूब होते हैं, जिससे इतना तो साबित ज़रूर होता है कि अगर अपने भारत महान में दूध की नदियाँ नहीं हैं, तो तेल और चाय के नाले ज़रूर हैं.

अगर कहीं आप पुरानी जनरेशन वाले गानों के रसिक हुए तो क्या आश्चर्य! कि इन दागों को देखकर आप बरबस ही मन्ना डे को गुनगुनाने लगें (लागा चुनरी में दाग छिपाऊं कैसे…). एक अदद रजिस्टर दुबका-सा पड़ा होता है इसी मेज पर, जो प्रथमदृष्टया लाइब्रेरी के परिवेश से अपने कमाल के अनुकूलन के कारण नज़र ही नहीं आता, पर उसी में आपको अपना नाम पता दर्ज करना होता है.

मेज के दोनों ओर रखी प्लास्टिक की कुर्सियां आमने-सामने तैनात कौरव-पांडव सेना की याद दिलाती हैं. पर घोर कलियुग के चलते सात अक्षौहिणी की बजाय वे सात-आठ ही हुआ करती हैं. सामने की ओर रखी हुई एक दो मेज और इनके इर्द-गिर्द रखी कुर्सियां जो लाइब्रेरी स्टाफ के काम आती हैं. इन्हीं मेजों पर कुछ नए-पुराने अखबार उदास पड़े होते है, बिलकुल ‘डु नॉट डिस्टर्ब में’ वाले मुद्रा में.

लेकिन इनमें से जिसे सबसे ज्यादे डिस्टर्ब किया जाता है, वह होता है लाल और काले रंग में छपा हुआ एक साप्ताहिक जो सरकारी नौकरियों आदि की खबर देता है, जिसके मुख्य पृष्ठ पर मोटे हर्फों में लिखा होता है ‘रोजगार समाचार‘.

रहिमन सिट साइलेंटली – 2 यहाँ पढ़ें.

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5 thoughts on “‘रहिमन सिट साइलेंटली’ – 1

  1. Jabardast Article…Mujhe kuch aisa hi feel hota hai benaas me…Par sabd nahi the…Aapne sahi tarah Urel ke rakh diya…Waiting for par-2 desperately

  2. Pingback: ‘रहिमन सिट साइलेंटली’ – 2 | हरिश्‍चन्‍द्र पत्रिका

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