‘रहिमन सिट साइलेंटली’ – 2

Aside

शुभनीत कौशिक

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लाइब्रेरी की तस्वीर का खाका तो मैंने पिछले भाग में खींच दिया  था, अब आइए इसमें कुछ रंग भरा जाए. तो गुरु! अब हम बनारस-मध्ये स्थित इस लाइब्रेरी में पहुँच गए. पहुंचकर नौसिखुओं की तरह इधर-उधर करने की बजाय हम सीधे एक स्टाफ से लाइब्रेरी के स्टाफ से ‘मेम्बरशिप’ के प्रावधान के बारे में अपनी जिज्ञासा रख देते हैं. पर समाधिस्थ भगवन शंकर की तरह ‘पप्पूजी’अपने सफाई कार्यक्रम में लगे रहते है.

किताबों को साफ़ करने में उनकी तन्मयता देखकर हमें असफल होती सरकारी ‘संपूर्ण स्वच्छता अभियान’ पर खेद होता है, जो गुरु आप भी मानेंगे कि अकारण नहीं था. अपनी इस उपेक्षा को देखकर हम चुपके-से एक कुर्सी पर अपनी तशरीफ़ रख देते हैं और अपना वक़्त आने का इंतज़ार करते हैं. तभी स्टोरी में एक नए करैक्टर ‘मिसिरजी’ का पदार्पण होता है.

‘मिसिरजी’ एकदम ‘प्रक्टिकल’ आदमी है, मुझ नए को देखकर, उन्होंने अपना रुख मेरी ओर किया, और मेरे वहां होने का ‘हेतु’ जानना चाहा. हमारे श्रीमुख से रिसर्च करने की बात सुनकर ‘मिसिरजी’ की बांछे खिल गयीं (वे शरीर में जहाँ कहीं भी होतीं हों). फिर ‘मिसिर जी’ ने अपने तमाम दुखड़े सुनाये, जिसमें लाइब्रेरी के कर्ता-धर्ताओं की लापरवाही, कम वेतन, सहयोगियों का अभाव आदि बातें शामिल थीं.

‘मिसिर जी’ के अनुसार पुरानी पत्रिकाओं, अख़बारों को निकालने का काम काफी बोझिल और ध्यान की मांग करता था. जो बिना सुविधा-शुल्क के सम्भव नहीं था. ‘मिसिर जी’ के इस बयान को सुनकर हमने शुल्क चुकाया और फिर अपने अध्ययन में लगे. हमने देखा ‘मिसिर जी’ के चेहरे पर अपनी जेब में आई कुछ गर्मी-से एक अपूर्व लालिमा छा गयी. ‘मिसिर जी’ ने हर रिसर्चर के लिए रखे हुए अपने हजारों किस्सों की फेहरिस्त, जो ऐसे ही मौकों के लिए उन्होंने रख छोड़ी है, में से एक तपाक-से मुझे सुना डाली. जिसके अनुसार अभी कुछ दिन ही हुए एक ‘बाबु साहब’ तीन-चार साल जी-तोड़ मेहनत कर लाइब्रेरी के बरामदे में नीचे बैठकर पत्र-पत्रिकाएं पढ़कर चित्रकूट के किसी सरकारी कालेज में प्रवक्ता के पद पर अपनी जगह सुनिश्चित की.

यह किस्सा और ऐसे कई किस्से सुनाकर ‘मिसिर जी’ जब उनका ‘दी एंड’ करने को होते तो यह क्षेपक जरुर जोड़ देते कि ‘बाबु साहब’ बाकायदे ‘मिसिर जी’ के चाय-पानी का बढ़िया इंतजाम भी करते थे जो उनकी सफलता का सबसे महत्वपूर्ण कारण बना. और इस किस्से और उसमें चस्पा किये गए अपने क्षेपक कि पुष्टि ‘मिसिर जी’ वहां मौजूद अन्य गवाहों से करा देते, जो उस घटनाक्रम के प्रत्यक्षदर्शी होते, और इस तरह पूरा मामला ‘वेरीफाई’ हो जाता. इस लाइब्रेरी में (बहुतेरी अन्य की तरह), ‘कृपया शांत रहें’ की नोटिस, सार्वजनिक जगहों, पार्कों पर लगी ‘नो स्मोकिंग’ की नोटिस की तरह (जिसका वहां मौजूद लोगों के व्यवहार से कोई लेना-देना नहीं होता) बेकार ही साबित होती है.

@Devendra Pandey

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‘मिसिर जी’ की जुबान पर लगाम लगा दे, ऐसा माई का लाल तो अभी तक पैदा नहीं हुआ. इसी बीच कुछ अन्य लोग भी आ ही जाते हैं. ‘मिसिर जी’ ने उनमें से कुछ से पैलगी, नमस्कार आदि कर कोरम पूरा किया. एक अन्य स्टाफ ‘कुमार’ भी आ चुके हैं, और एक बजे साठोत्तरी कविता की तरह साठ पार वाले, देश-दुनिया देख चुके, घाट-घाट का पानी पी चुके ‘पांडे जी’ आते हैं.

अपने भूरे अधबाँही खद्दर वाले कुर्ते और घुटनों तक की धोती में ‘पांडे जी’ एकदम किसी पुरानी हिंदी पत्रिका के सहायक-संपादक जान पड़ते हैं और मानते हैं कि ‘अपनी ज़िन्दगी में जो मैंने नहीं देखा, वह दुनिया में किसी ने नहीं देखा’ और पुरानी पीढ़ी की तरह यकीनी तौर पर मानते हैं कि ‘अब पिछले ज़माने वाली बात नहीं रह गयी’ साथ ही, ‘अब लाइब्रेरी के काम में पहले-सा मजा आता नहीं’ और इन वाक्यांशों की माला वे अक्सर ही फेरते हुए पाए जाते हैं .

यहीं-से ‘मिसिर-पांडे संवाद’ भी शुरू हो जाता है. ‘पांडेजी’ अपने रोज के अभ्यास के तौर पर रजिस्टर में अपना नाम लिखकर अपनी तय जगह पर बैठ जाते हैं, लाइब्रेरी के काउंटर वाले मेज के बायीं तरफ रखी लाल रंग की कुर्सी पर (इससे यह निष्कर्ष कतई न निकालें कि वे वामपंथी हैं). वह अख़बार पढना शुरू करते हैं और इधर ‘मिसिरजी’ चटखारे ले-लेकर लाइब्रेरी और संस्था से जुडी ताजातरीन खबरों को उनसे और लाइब्रेरी में मौजूद सबसे साझा करते है (‘मिसिरजी’ के इस समर्पित जर्नलिज्म को देखकर आपको बरबस ही आजकल के तथाकथित ‘खबरिया चैनलों’ पर रोना आ सकता है).

बीच-बीच में, ‘पांडेजी’ हुंकारी भरते है, तो कभी खिसिया कर कहने लगते हैं, ‘देखा यार हमरा के इ कुल से कौनो लेवे-देवे के नइखे. हमके त अधिकारी कह गईल बा कि ‘पांडेजी आप लाइब्रेरी में बैठिये, जिससे वहां की व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे और कुछ काम आपको करना नहीं है’. फिर ‘पांडेजी’ पूछते हैं ‘कहो कुमारजी! आज हिंदुस्तान पेपर ना आईल बा का?’. कुमार तुरंत ड्रावर में रखे अख़बार को निकाल ‘पांडेजी’ के समक्ष रखते हैं और जोड़ते हैं ‘ये लीजिये गुरूजी! कुछ लोग मुंह उठा के चल आवेला खाली अख़बार पढ़े खातिर, एही लिए भीतर रख दिए थे’.

@Devendra Pandey

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‘पांडेजी’ अख़बार पढ़ते-पढ़ते उकताकर अब उसपर ‘रनिंग कमेंट्री’ करने लगते हैं. हाँ भाई! उसका भी बनारसी तरीका होता है पहले एक राष्ट्रीय/स्थानीय खबर की ‘हैडिंग’ को मौजूद लोगों में एक जुमले की तरह उछाल दिया जाता है, फिर मौजूद लोगबाग अपनी-अपनी बारी आने पर उस पर टीका-टिप्पणी करते हैं. मसलन, ‘पांडेजी’ जोर से पढ़ते हैं ‘नहीं होगी वाहनों से अवैध वसूली- एस पी वाराणसी’. फिर टीका-टिप्पणियों के दौर का आगाज़ होता है. ‘पांडेजी’ होठों के कोनों को जरा-सा फैलाकर मुस्करा देते हैं, जो इस बात का सिग्नल है कि ‘मिसिरजी’ तोहार बारी हवे?

‘मिसिरजी’ तुरंत आये हुए अवसर को लपक कर टिप्पणियों का दौर शुरू करते हैं,’ अब गुरूजी इ त हद हो गईल. अरे अभी क दिन भईल दो एक्सीडेंट भायल ट्रक से, जबकि ओ समय शहर में ट्रक खातिर ‘नो-इंट्री’ रहल. ट्रक ड्राईवर वसूली के डर के मारे फुल स्पीड में भगावत रहा ट्रक, बस फिर क एक्सीडेंट हो गईल’, ‘अ जब गाँव क लोग हंगामा कईलन त पुलिस उल्टा गाँव के लोगन पे लाठी चार्ज कईल अ कुछ के ता सुने में आयल कि जेल में डाल देहल बा’. ये सब सुनकर ‘पांडेजी’ क मिजाज गड़बड़ा जाता है. और अब वे ‘फेंकू गुरु’ के बारे में ‘मिसिरजी’ से पूछते हैं. ‘मिसिरजी’ के अन्दर का जर्नलिज्म भाव जाग जाता है और वे तुरंत बताते हैं कि ‘आज कोर्ट में तारीख रहल ह, ओहि में गयल हवन. संस्था के ओर से आये-जाए खातिर मुद्रा भी मिलल हउए’.

‘मिसिरजी’ उसी सुर में कह जाते हैं, ‘देखा गुरु! अभी पंद्रह मुकदमा त चलते हव पंद्रह ठे और हो जाई ता रोज तारीख पड़ी, तीस दिन तीस मुकदमा.’ और फिर वे अपने रौ में हँसते है जिससे एकबारगी लाइब्रेरी की बिल्डिंग हिल जाती है. (अब आप यहाँ अपना ‘कॉमनसेन्स’ लगाकर कह सकते हैं कि भाई महीने में चार तो रविवार भी पड़ते हैं, इस तरह संस्था को कुल छब्बीस यानि बाकि ग्यारह मुकदमों की जरुरत है. पर जिंदगी को ‘प्रैक्टिकल’ जीने वाले ‘मिसिरजी’ स्वीकारते हैं कि अगर उनके पास ये ‘कॉमनसेन्स’ होता तो वे स्कूली शिक्षक कि नौकरी छोड़कर यहाँ लाइब्रेरी में घास छिलने नहीं आते).

‘पांडेजी’ के माथे पर ये बात सुनकर ज़रा शिकन आ जाती है और वे अचानक कुछ और बूढ़े हो जाते हैं. पर ‘एंग्री-ओल्डमैन’ की तरह तुरंत पलट कर ज़वाब देते हैं, ‘जेके कुक्कुर कटले बा उ लड़े संस्था से. संस्था त एही जगे रही, कहूँ क बस का बात नइखे. अरे हम त सन बिरासिये (सन बयासी, जबसे ‘पांडेजी’ संस्था से और संस्था उनसे जुडी है) से न देख रहल बाणी, कहूँ कुछ उखाड़ न पायिल. केतना जोधा लोग आयिले-गंयिले!’

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‘मिसिरजी’ गुरूजी का मिजाज देख तुरंत पैतरा बदलते हैं, ‘गुरूजी! आजकल काम क बोझ बहुत बढ़ गयल हव. संस्था से डायरी अ कुछ किताब बांटे खातिर मिलल हव हमहूँ रिक्शा भाडा लेइ के छोडली हा. ऐसे कैसे छोड़ देती आखिर ‘कमर्शियल’ आदमी हैं हम. एकदम पादे भर क फुर्सत ना हव आजकल’. (फ़िराक होते तो संजीदगी से ‘संस्कृतनिष्ठ’ हिंदी में कहते, ‘आजकल तो पृष्ठ-भाग से पवन मुक्त करने तक का अवकाश नहीं है’. और फिर जोरदार ठहाका लगते, जो कैंपस में सबको सुनाई पड़ता. पर गुरु! ‘ना सुखनवर रहे ना सुखनदानी किस बिरते इत्ता पानी…’).

और अब लाइब्रेरी की घड़ी में दिन के तीन बज रहे हैं. हम भी बाहर स्थित सुलभ काम्प्लेक्स के शौचालय से लगे मूत्रालय में लघुशंका दूर कर आये हैं. गनीमत है कि यहाँ पर अस्सी वाले ‘पप्पू टी स्टाल’ के बगल में स्थित ‘अवैध’ मूत्रालय, जहाँ ये चेतावनी काले अक्षरों में अंकित है ‘देखो मादर… मूत रहा है’, जैसी कोई चेतावनी नहीं थी क्योंकि यह ‘वैध’ मूत्रालय था . (अब देखिये इस मुद्दे पर जगह-जगह जुदा-जुदा रवैये अपनाये जाते हैं. मसलन, दिल्ली में आप ऐसी जगहों पर लिखा हुआ पायेंगे, ‘गधे के पूत यहाँ मत मूत’! पर गुरु बनारस में ‘लघुशंका’ से निवृत्त होने भर में आपके ऊपर, एक हिंदी लेखक के वाक्यांश का उधार लेकर कहूँ तो, ‘अगम्य-विशेष के साथ अकृत्य विशेष’ करने का ठप्पा लगा दिया जाएगा.)

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‘मिसिरजी’ थोड़ी बेचैनी-से घड़ी की ओर देखते हैं. उनकी यह अकुताहट देख मुझे ‘पाश’ की पंक्तियाँ याद आती है, ‘सबसे खतरनाक वो घड़ी होती है/ आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो/ आपकी नज़र में रुकी होती है’. अब ‘मिसिरजी’ ‘पप्पू’ को खोज रहे हैं. तभी पप्पू खांसते हुए लाइब्रेरी में दाखिल होते हैं. उनके हाथ में हरे रंग की एक पोलिथिन है, जिसमें कुछ दवाइयां भरी हुई हैं. और काउंटर वाली मेज के पास जा धम्म से कुर्सी पर बैठ जाते हैं.

‘मिसिरजी’ लगभग खिसियाते हुए कहते हैं, ‘अभी तक कहाँ रहला ह बेटा! केतना बार तोसे कहली की घामे में मत घूम पर तू सारे मनबे नहीं. त जो मर, अरे इहाँ पंखा चलत हौ, आराम से बैठा काम करा!’ पप्पू अपनी लाचारगी भरी निगाह से सबकी ओर देख चुकने के बाद माथे पर छल-छला आये पसीने को अपने गर्द हरे रंग के गमछे से पोछ डालते हैं.

‘मिसिरजी’ अजीत (एक अन्य रिसर्चर) की ओर मुखातिब होते हैं और कहते हैं, ‘अजीत! तनी चाय मंगवा दा यार, एकदम गला सुखाय गयल हव!’. और पप्पू को केहुनी से कोंच कर उठा देते हैं. पप्पू अनमने ढंग से आकर अजीत के पास खड़े होते हैं. अजीत अपना पर्स निकालते हुए ‘मिसिरजी’ से पूछते हैं, ‘केतना दें हो मिसिरजी ?’ ‘मिसिरजी’ कहते हैं, ‘अरे! बीस ठे दे दा. तनी बिस्कुटवो माँगा दा.’ अजीत थोडा झुंझला जाते हैं, ‘धत्त मर्दवा तुहूँ ‘मिसिरजी’. और पप्पू हाथ में बीस की नोट दाबे केतली लेकर बाहर निकल जाते हैं.

पंद्रह मिनट बाद पप्पू फिर प्रकट होते हैं- हाथ में चाय और कुछ भरुकियां लिए हुए (आप अपने हिसाब से उन्हें चुक्कड़/कुल्हड़ भी कह सकते है). पहले चाय ‘पांडेजी’ को दी जाती है फिर बाकियों को. चाय बस इतनी ही है कि बमुश्किल एक घूंट हलक के नीचे उतारी जा सके. कुल्हड़ को नीचे रखे डब्बे में फेंक ‘मिसिरजी’ खड़े हो जाते हैं. (गुरु! अगर आप भी उन्हें इस तरह खड़े हुए देखें तो इसमें शक की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती कि एकदिन अपना भारतीय रूपया भी डॉलर के मुकाबले मजबूती से खड़ा होगा.)

‘मिसिरजी’ के खड़े होने और भारतीय रुपये के अवमूल्यन में कोई तात्कालिक सम्बन्ध नहीं था. यह तो उनके घर जाने का समय हो चुकने का संकेत भर था क्योंकि लाइब्रेरी कि घड़ी अब दिन के साढ़े-तीन बजा रही थी. और इस तरह ‘मिसिरजी’ ने अपनी साइकिल निकली, जो लाइब्रेरी के बरामदे की दीवार से लगाकर खड़ी की हुई थी (क्योंकि ‘मिसिरजी’ के अनुसार बाहर खड़ी करने पर साइकिल के चोरी चले जाने का डर था), उस पर सवार हुए पूरी अदा-से, जैसे शायद कभी महाराणा प्रताप सवार हुए होंगे अपने प्रिय घोड़े चेतक पर, और पलक झपकते ही ‘मिसिरजी’ हमारी नज़रों-से ओझल हो गए.

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‘मिसिरजी’ के जाने के बाद ‘पांडेजी’, कुमार और पप्पू ‘मिसिरजी’ के ‘प्रक्टिकल’ और ‘कमर्शियल’ जीवनदर्शन की समालोचना करने लगते हैं. तभी मौका पाकर पप्पू शिकायत भरे लहजे में ‘पांडेजी’ से कहते हैं, ‘गुरूजी! देखल जाय, सब इ लोग मनमाने चलावत हा. कहूँ क लोग घुसा देवेला पत्रिका देखे खातिर, लोग पत्रिका देखलन, जहाँ मन भईल उहाँ रख के चल गईलन. कहूँ क पंजीकरण बा की न बा एकर देखल क कौनो जरुरत इ लोग न बुझात हौवन, अबही काल जब एगो पत्रिका के अंक न मिलत रहे तब दिमाग चकरिया गईल. हमसे घोङ्घाइच करे लागल लोग की तानी देखिह पप्पू की कहाँ रखा गईल बा पत्रिका.’

‘पांडेजी’ अपने गंभीर आवाज में बोले, ‘अरे यार! हम का बोलीं, हमार कहूँ सुने तब ना. अरे पहिले ता एहिंजे कुल शोधार्थी लोग बैठ के काम करें जा. अब देखत बानी त सबके घुसा देता लोग सीधे ‘स्टोर’ में. अरे करा लोग ऐसेहिं जब कुछ गायब होखी त संस्था के डंडा जब चली त बुझिह लोग. काम करो, लेकिन जो नियम- कायदा संस्था का है, उसका पालन करो. आखिर पैसा संस्था ही न दे रही है. अरे यार! जब नियम से कौनो काम होता है, तब्बे मजा भी आता है, ऐसे थोड़ी न. अ देखा संस्था से बना के रहबा लोग, संस्था तोहुंके बना दिही, न त इहो जानल-सुनल बात ह कि संस्था से बिगाड़ कइके कहूँ आगे ना बढ़ पावल हा.’

इतनी बात के बाद कुमार हमारी तरफ मुखातिब होकर बोले, ‘कौशिकजी! जरा चाय मंगवा दीजिये.’ और पप्पू से बोले, ‘पप्पू देखा कौशिकजी बोलवत हवन!’. पप्पू हमारे पास आकर खड़े हुए और हमने जेब से बीस रुपये निकल कर उनके हाथ में रख दिए, फिर केतली लेकर उनका जाना, पंद्रह मिनट बाद लौटकर चाय देना सबकुछ पहले जैसा ही था.

‘पांडेजी’ खड़े हुए, यह उनके वाचनालय की ओर जाने का सिग्नल था, क्योंकि कुमार ने झट-से उस कमरे की चाभी एक बॉक्स से निकालकर उनके हाथ में रख दी. वाचनालय से जब ‘पांडेजी’ लौटे तो वे फिर से अपनी पसंदीदा कुर्सी पर काबिज़ हो गए. अभी एक दिन वे इसी कुर्सी की खातिर कुमार पर भड़क गए. हुआ यूँ कि एक शख्स उस दिन लाइब्रेरी में आये और कुमार की सहृदयता का फायदा उठा वहां काबिज़ हो गए, जो असल में ‘पांडेजी’ की जगह थी.

‘पांडेजी’ जब अपने नियत समय दिन के एक बजे लाइब्रेरी में दाखिल हुए तो उन्होंने अपनी पसंदीदा जगह पर किसी और को पाया. खैर उन्होंने रजिस्टर में अपनी दस्तखत की, अख़बार उठाया और एक दूसरी कुर्सी पर बैठ गए. अख़बार ख़त्म कर लेने के बाद जब उनसे नहीं रहा गया तो बोले, ‘अरे कुमारजी! जब आप जानते हैं कि हम उसी कुर्सी पर बैठते हैं तो वहां किसी और को काहे बैठाते हैं. अरे जब तक हम इहाँ हैं तब तक हमको इज्ज़त दे दीजिये, बाकि बाद में भगवान भरोसे! अब बताइए हमारा इधर बैठना शोभा देता है, कहिये तो जाके दरवाजे पे बैठूं.’

कुमार को अब अपनी भूल का अंदाज़ा हुआ, और तपाक-से उन्होंने उस शख्स को वहां से उठा दिया. और अब लाइब्रेरी की घडी में साढ़े-चार बज गए थे, जो लाइब्रेरी के बंद करने का संकेत था. हम भी अपना बैग समेटकर बाहर निकल लिए. और अंत में सांझ-सकारे गोधूलि वेला में घर लौटते हुए ‘हरिऔध’ जी की पंक्तियाँ जेहन में उभर आती हैं,

दिवस का अवसान समीप था
गगन था कुछ लोहित हो चला
तरु शिखा पर थी अब राजती
कमलिनी-कुल-वल्लभ की प्रभा’.

समाप्त

रहिमन सिट साइलेंटली – 1 यहाँ पढ़ें.

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‘रहिमन सिट साइलेंटली’ – 1

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शुभनीत कौशिक

बनारस के बारे में कुछ लोग जो एक रूमानी-सी तस्वीर अपने जेहन में संजोये रखते हैं, उसे काल्पनिक ही समझना चाहिए, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता, और अगर ऐसा होता है भी, तो इसे मात्र एक ‘संजोग’ (को-इन्सिडेंस) ही समझा जाना चाहिए.

तो साधो! अपने बनारस के बारे में बरसों से सुविज्ञ लेखकों द्वारा जुदा-जुदा भाषाओँ में गुरु-गंभीर लेखन कार्य होता रहा है. अगर आप अंग्रेजीदां हैं तो एम ए शेरिंग (‘बनारस द सेक्रेड सिटी ऑफ़ द हिन्दुस् इन एंशिएन्ट एंड मॉडर्न टाइम्स‘), डायना एल एक (‘बनारस द सिटी ऑफ़ लाइट‘), और के चन्द्रमौलि (‘फ्रॉम लुमिनस काशी टु वाइब्रेंट वाराणसी’) की गंभीर शोधपरक किताबें मौजूद हैं.

गुरु! हमें जो किताबें पसंद आती हैं वे हैं, विश्वनाथ मुखर्जी की ‘बना रहे बनारस‘ और काशीनाथ सिंह की ‘काशी का अस्सी‘, क्योंकि इनमें आपको झलक मिलती है उस बनारस की जो ‘आर्काइव्ज’ या लाइब्रेरी की मोटी जिल्द वाली, धूल फांकती किताबों में नहीं बंद है, बल्कि जो बनारसियों की रोजमर्रा की जिंदगी में पैबस्त है. पंजाबी के कवि ‘पाश’ की पंक्तियाँ हैं ‘…

भारत/ शब्द का अर्थ/ उन खेतों में दायर है/ जहाँ अन्न उगता है/ जहाँ सेंध लगती है’.

बनारस के बारे में यूँ ही कहूँ तो ‘… बनारस/ शब्द का अर्थ/ उन घाटों में दायर है/ जहाँ अड़ी जमती है/ जहाँ भंग छनती है’.

उन्नीसवीं सदी के बनारस के अप्रतिम लेखक भारतेंदु ने लिखा था, ‘ देखि तुमरि कासी संतो देखि तुमरि कासी’, जिसमें आगे वे काशी को आधा तो भांड, भड़ेरिया , बाभनों और संन्यासियों से भरा पाते है तो आधी काशी उन्हें रंडी, मुंडी, रांड, खानगी, खासी से भरी मिलती है.

प्रचलित कहावत है गुरु, अपने बनारस के बारे में ‘रांड सांड सीढ़ी संन्यासी/ इनसे बचे तो सेवै काशी’. तो इस दफे जेठ की धूप से तप- तपाये, चिलचिलाये बनारस की गलियों में तनिक हम भी सैर-सपाटा मार ही आये. तो बस उसी बनारसी जेठ की कुछ दुपहरियों का ब्यौरा यहाँ दे रहा हूँ.

बनारस से करीब नौ किमी दूर पांडेयपुर है, जो शहर का किनारा है, जहाँ शहर ख़त्म होता है और श्रीलाल शुक्ल के शब्दों में कहूँ तो, ‘जहाँ से भारतीय गाँवों का विशाल महासागर शुरू होता है’.

यहीं से ऑटो में बैठकर, धूल फांकते हुए ठेठ बनारस की ओर बढ़ लेते हैं ( सनद रहे, प्रकृति के सुकुमार कवि पन्त की पंक्तियाँ ‘खेतों में फैला है श्यामल/ धूल भरा मैला-सा आँचल/ भारत माता ग्रामवासिनी.) आजकल ऑटो चालक लोग परेशान हैं, कारण आर.टी.ओ. की चेकिंग चल रही है भाई! कई ‘फरमान’ अब तक जारी हो चुके हैं. मसलन, पहले की हरे-पीले रंगों से पुती हुई ऑटो को (जो आँखों को सुकून तो देती ही है, हरियाली फ़ैलाने के उद्यम में बरसों से लगे अपने सरकारी पर्यावरण एवं वन मंत्रालय का भी खासा सहयोग कर देती है.

गुरु आप तो वाकिफ ही हैं, कि अपनी लोकतान्त्रिक सरकार उसका भला चाहने/करने वालों को भला कब अपना समझती है), फिर से काला करने को कहा गया, ऑटो में सिर्फ चार सवारियों को ले जाने कि इजाज़त दी गयी (क्या मजाक है,भाई?). पर ऑटो चालक संघ ने फ़ौरन ही अपनी मीटिंग की, और अपना ‘फरमान’ जारी किया कि ‘सरकारी फरमान’ से कम हुई एक सवारी से होने वाले वित्तीय घाटे का निराकरण बाकी चार सवारियों से बढे हुए भाड़े लेकर किया जाये. और जैसा होना ही था, इस फरमान से जहाँ ऑटो और चालक को को राहत मिली, वहीँ सवारियों कि जेबें कुछ और हल्की हो गयी, जिसके एवज में सवारियों ने कभी ऑटो-चालकों को, तो किसी ने प्रदेश सरकार, और किसी ने मनमोहन सरकार को पानी-पानी पीकर कोसा.

तो गुरु! कुछ बनारस का हाल-चल होई जाये. बनारस विगत कुछ वर्षों से जवाहरलाल नेहरु नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन की चपेट में आ गया है, और बनारस की हालत पतली कर देने में वाराणसी विकास प्राधिकरण ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है, अतिक्रमण के चलते चौक-तिमुहानियाँ भारतीय बाघों की तरह गायब होती जा रहीं हैं. और सड़क का हाल तो किसी बनारसी से पूछियेगा नहीं तो क्लोरोमिंट का ‘दुबारा मत पूछना’ वाला हाल कर देगा और आप टापते रह जाइएगा. अब बनारस की सड़क और ट्रैफिक जामों के बारे में क्या कहूँ? कभी मीर ने दिल्ली के बारे में कहा था, ‘दिल्ली जो एक शहर था आलम में इन्तिखाब…’. वैसे ही कहूँ तो,

‘बनारस जो एक शहर है
ट्रैफिक से लबालब
मिलती है जहाँ सड़क
गड्ढों में कहीं-कहीं…’

अब देखिये गुरु! मैं यहाँ ‘जामों से लबालब’ भी कह सकता था, लेकिन कतिपय लोग जाम का अर्थ ट्रैफिक के सन्दर्भ में न लगाकर कहीं और लगाते. हालाँकि, भला हो जायसवाल जी का मधुशाला की दुनिया में भी अपना झंडा फहराए हुए हैं और ‘लिकर किंग’ पोंटी चड्ढा के इंतकाल के बाद कई अन्यों के साथ अपने मजबूत कन्धों पर मैखाने का साम्राज्य संभाले हुए हैं, जिससे अगर कोई ‘भोला भला मदिरालय जाने को निकले’ और ‘असमंजस में आ जाए ‘ तो वे एक रह पकड़ने को कह मदिरालय तक जरुर पहुंचा देंगे.

बड़ी- बड़ी योजनाओं के नाम पर इस पुराने शहर को खोद कर रख दिया गया है, ओवरब्रिज खड़े किये गए पर न सीवर की समस्या सुलझी है न जाम की. बनारसी भी इनसे तंग आ चुके हैं, ‘और का-का बने के हव भैया, अ कब ले बनी?’ ये सवाल पूछ-पूछकर आम बनारसी थक चुका है. अड़ी पर इन समस्याओं की रोज ही खबर ली जाती है पर अब अड़ी भी नए बनारसियों को कहाँ रुचती है, वे तो अक्सरहा नए खुले जे एच वी, आई पी माल में दीखते हैं. ग़ालिब ने दिल्ली और अपनी तंगी की ओर इशारा करते हुए लिखा था,

है अब इस मामूर में कहते गमे-उल्फत ‘असद’
हमने ये माना कि दिल्ली में रहें, खायेंगे क्या.

अब चूँकि खाने का सवाल बनारसी के लिए उतना अहम नहीं है जितना बनारस, अड़ी, भंग, पान, और महादेव हैं. अब अड़ी की कमी अड़ीबाजों को खलने लगी है इसलिए मैं तो कहूँगा,

है अब बनारस में अड़ीयों की कमी ‘कौशिक’
हमने ये माना कि काशी में रहें, जमायेंगे कहाँ.

साधो! यहाँ अड़ी ज़माने में आ रही दिक्कतों की ओर इशारा किया गया है. अड़ी के बारे में जानने के लिए ‘काशी का अस्सी’ पढ़ें. अड़ी वह जगह है जहाँ लोग-बाग़ तमाम मुद्दों पर अपने ख़यालात बातों, गालियों से जाहिर करते हैं, कभी-कभी नौसिखुओ में पिटा-पिटौवल भी हो जाता है. अब चर्चा के ये मुद्दे कुछ भी हो सकते हैं. मसलन बराक ओबामा, कृष्ण-सुदामा, वास्कोदीगामा या फिर किसी के मामा. बनारसी मानते हैं कि डॉक्टर की दवा और गंगा उस पार की हवा एक जैसा ही असर करती हैं. सो वे उधर हवा खाने और दिव्य निपटान करने जाया करते हैं. और पवित्र गंगा में ही गांड भी धो लेते हैं, बांये हाथ से ही. याद रखिये, कवि ‘धूमिल’ की ये पंक्तियाँ,

‘आदमी
दायें हाथ की नैतिकता से
इस कदर मजबूर होता है
कि तमाम उम्र गुज़र जाती है
मगर गांड
सिर्फ बांया हाथ धोता है…’

तो हम अब पहुँच गए हैं शहर के बीच में मौजूद एक लाइब्रेरी में, अब मालिक नाम में क्या रखा है? कुछ भी रख लीजिये, अपने स्वादानुसार. काम कि बात ये है कि हमारी अधिकांश लाइब्रेरी एक ही तरह की हुआ करती हैं, जो मानक भारतीय समय के अनुसार पूर्व-निर्धारित सुबह के दस बजे की बजाय ग्यारह बजे खुलती है, और शाम के पांच बजे की बजाय साढ़े-चार पर बंद हो जाया करती है.

इन लाइब्रेरियों में गाहे-बगाहे कुछ सीनियर सिटीजन (रिटायर होने के बाद घर में पड़े रहने से कलह बढ़ता है, इस सिद्धांत को मानकर, अख़बारों के एक-एक शब्द को पढ़ जाने के ज़ज्बे के साथ और दोपहर में कुर्सियों पर बैठे हुए एकाध झपकी लेने की अपनी ऑफिस वाली पुरानी आदत के मुताबिक), कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए ‘शूरमा भोपाली’, और कुछ अपन जैसे लोग पार्टनर!(जो बकौल, ‘रागदरबारी’ वाले रंगनाथ, ‘आजकल मक्खियाँ मार रहे हैं’ (दूसरे शब्दों में, कुछ ‘रिसर्च जैसा’ कर रहे हैं.) पहुँच जाया करते हैं.

गुरु! अगर आपको ‘जेनेरलाईजेसन’ न लगे तो मैं कहूँगा: ‘लाइब्रेरी एक पुरानी पीले रंग की बिल्डिंग हुआ करती है, जो अन्दर से कई सालों पहले चूना की हुई होती है. गोदरेज की कुछ शीशा लगी, कुछ लकड़ी की आलमारी और कुछ लकड़ी के रैक भी इसी इमारत अपनी-अपनी पोजीशन पर तैनात होते हैं.

छत-से कोई दो हाथ नीचे एक कतार में गाँधी, नेहरु, प्रेमचंद और किसी अन्य स्थानीय महापुरुष और लाइब्रेरी के संस्थापक की मढ़ाई हुई तस्वीरें लटकी होती हैं, जो माहौल को ज़रा ‘इमोसनल’ बनाती हैं. काफी ऊपर को उठी हुई छत, और उसमें लगे हुक के सहारे लटके हुए आदिम काल के पंखे, जो इस क्षणभंगुर संसार में अपने ‘सम्यक व्यायाम’ के चलते स्थित-प्रज्ञ हो चले होते हैं.

रीडिंग रूम में सागौन की लकड़ी से बने हुए चौपाये मेज (जिनकी स्थिरता पर कोई शंका करना, सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर उंगली उठाने जैसा है), जो अनादि-काल से उसी अवस्था में पड़े हुए हैं और बी आर चोपड़ा की ‘महाभारत’ के सूत्रधार के अंदाज़ में चाहें तो कह सकते हैं, ‘मैं समय हूँ!’.

एकसाथ लगाकर रखे हुए इन मेजों पर इक पुरानी मेजपोश पड़ी होती है, जो लाइब्रेरी की इज्ज़त ढकने के काम आती है, उस पर कहीं चाय तो कहीं तेल के दाग भी खूब होते हैं, जिससे इतना तो साबित ज़रूर होता है कि अगर अपने भारत महान में दूध की नदियाँ नहीं हैं, तो तेल और चाय के नाले ज़रूर हैं.

अगर कहीं आप पुरानी जनरेशन वाले गानों के रसिक हुए तो क्या आश्चर्य! कि इन दागों को देखकर आप बरबस ही मन्ना डे को गुनगुनाने लगें (लागा चुनरी में दाग छिपाऊं कैसे…). एक अदद रजिस्टर दुबका-सा पड़ा होता है इसी मेज पर, जो प्रथमदृष्टया लाइब्रेरी के परिवेश से अपने कमाल के अनुकूलन के कारण नज़र ही नहीं आता, पर उसी में आपको अपना नाम पता दर्ज करना होता है.

मेज के दोनों ओर रखी प्लास्टिक की कुर्सियां आमने-सामने तैनात कौरव-पांडव सेना की याद दिलाती हैं. पर घोर कलियुग के चलते सात अक्षौहिणी की बजाय वे सात-आठ ही हुआ करती हैं. सामने की ओर रखी हुई एक दो मेज और इनके इर्द-गिर्द रखी कुर्सियां जो लाइब्रेरी स्टाफ के काम आती हैं. इन्हीं मेजों पर कुछ नए-पुराने अखबार उदास पड़े होते है, बिलकुल ‘डु नॉट डिस्टर्ब में’ वाले मुद्रा में.

लेकिन इनमें से जिसे सबसे ज्यादे डिस्टर्ब किया जाता है, वह होता है लाल और काले रंग में छपा हुआ एक साप्ताहिक जो सरकारी नौकरियों आदि की खबर देता है, जिसके मुख्य पृष्ठ पर मोटे हर्फों में लिखा होता है ‘रोजगार समाचार‘.

रहिमन सिट साइलेंटली – 2 यहाँ पढ़ें.

किशोर कुमारः उन्होंने तय कर लिया था कि मुझे स्टार बनाना है

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प्रीतीश नन्दी द्वारा लिया गया किशोर कुमार का यह साक्षात्कार Illustrated Weekly of India (April, 1985) में प्रकाशित हुआ था।

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चित्र गूगल इमेज से

प्रीतीश : मैंने सुना है कि आप बम्बई छोड़ कर खण्डवा जा रहे हैं……

किशोर ः इस अहमक, मित्रविहीन शहर में कौन रह सकता है, जहां हर आदमी हर वक्त आपका शोषण करना चाहता है ? क्या तुम यहाँ किसी का भरोसा कर सकते हो ? क्या कोई भरोसेमंद है यहाँ ? क्या ऐसा कोई दोस्त है यहाँ जिस पर तुम भरोसा कर सकते हो ? मैं तय कर लिया है कि मैं इस तुच्छ चूहादौड़ से बाहर निकलूँगा और वैसे ही जिऊँगा जैसे मैं जीना चाहता था। अपने पैतृक निवास खण्डवा में। अपने पुरखों की जमीन पर। इस बदसूरत शहर में कौन मरना चाहता है !!

प्रीतीश ः आप यहाँ आए ही क्यों ?

किशोर ः मैं अपने भाई अशोक कुमार से मिलने आया था। उन दिनों वो बहुत बड़े स्टार थे। मुझे लगा कि वो मुझे के एल सहगल से मिलवा सकते हैं, जो मेरे सबसे बड़े आदर्श थे। लोग कहते हैं कि वो नाक से गाते थे….लेकिन क्या हुआ ? वो एक महान गायक थे। सबसे महान।

प्रीतीश ः मुझे लगता है कि आप सहगल के प्रसिद्व गानों का एक एलबम तैयार करने की योजना बना रहे हैं।

किशोर ः मझसे कहा गया था। मैंने मना कर दिया। उन्हें अप्रचलित करने की कोशिश मुझे क्यों करनी चाहिए ? उन्हें हमारी स्मृति में बसे रहने दीजिए। उनके गीतों को उनके गीत ही रहने दीजिए। एक भी व्यक्ति को यह कहने का मौका मत दीजिए कि किशोर कुमार उनसे अच्छा गाता है।

प्रीतीश ः यदि आपको बाम्बे पसंद नहीं था तो आप यहाँ रुके क्यों ? प्रसिद्धि के लिए ? पैसे के लिए ?

किशोर ः मैं यहाँ फँस गया था। मैं सिर्फ गाना चाहता था। कभी भी अभिनय करना नहीं चाहता था। लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों की कृपा से मुझे अभिनय करने को कहा गया। मुझे हर क्षण इससे नफरत थी और मैंने इससे बचने की हर संभव तरीका आजमाया।

मैं सिरफिरा दिखने के लिए अपनी लाइनें गड़बड़ कर देता था, अपना सिर मुंड़वा दिया, मुसीबत पैदा की, दुखद दृश्यों के बीच मैं बलबलाने लगता था, जो मुझे किसी फिल्म में बीना राय को कहना था वो मैंने एक दूसरी फिल्म में मीना कुमारी को कह दिया – लेकिन फिर भी उन्होंने मुझे जाने नहीं दिया। मैं चीखा, चिल्लाया, बौड़म बन गया। लेकिन किसे परवाह थी ? उन्होंने तो बस तय कर लिया था कि मुझे स्टार बनाना है।

प्रीतीश ः क्यों ?

किशोर ः क्योंकि मैं दादामुनि का भाई था। और वह महान हीरो थे।

प्रीतीश ः लेकिन आप सफल हुए….

किशोर ः बेशक मैं हुआ। दिलीप कुमार के बाद मैं सबसे ज्यादा कमाई कराने वाला हीरो था। उन दिनों में इतनी फिल्में कर रहा था कि मुझे एक सेट से दूसरे सेट पर जाने के बीच ही कपड़ने बदलने होते थे। जरा कल्पना कीजिए। एक सेट से दूसरे सेट तक जाते हुए मेरी शर्ट उड़ रही है, मेरे पैंट गिर रही है, मेरी विग बाहर निकल रही है। बहुत बार मैं अपनी लाइनें मिला देता था और रूमानियत वाले दृश्य में गुस्सा दिखता था या तेज लड़ाई के बीच रूमानी। यह बहुत बुरा था और मुझे इससे नफरत थी। इसने स्कूल के दिनों के दुस्वप्न जगा दिए। निर्देशक स्कूल टीचर जैसे ही थे। यह करो। वह करो। यह मत करो। वह मत करो। मुझे इससे डर लगता था। इसीलिए मैं अक्सर भाग जाता था।

प्रीतीश ः खैर, आप अपने निर्देशकों और निर्माताओं को परेशान करने के लिए बदनाम थे। ऐसा क्यों ?

किशोर ः बकवास। वे मुझे परेशान करते थे। आप सोचते हैं कि वो मेरी परवाह करते थे ? वो मेरी परवाह इसलिए करते थे कि मैं बिकता था। मेरे बुरे दिनों में किसने मेरी परवाह की ? इस धंधे में कौन किसी की परवाह करता है ?

प्रीतीश ः इसीलिए आप एकांतजीवी हो गए ?

किशोर ः देखिए, मैं सिगरेट नहीं पीता, शराब नहीं पीता, घूमता-फिरता नहीं। पार्टियों में नहीं जाता। अगर ये सब मुझे एकांतजीवी बनाता है तो ठीक है। मैं इसी तरह खुश हूं। मैं काम पर जाता हूं और सीधे घर आता हूं। अपनी भुतही फिल्में देखने, अपने भूतों के संग खेलने, अपने पेड़ों से बातें करने, गाना गाने। इस लालची संसार में कोई भी रचनात्मक व्यक्ति एकांतजीवी होने के लिए बाध्य है। आप मुझसे यह हक कैसे छीन सकते हैं।

प्रीतीश ः आपके ज्यादा दोस्त नहीं हैं ?

किशोर ः एक भी नहीं।

प्रीतीश ः यह तो काफी चालु बात हो गई।

किशोर ः लोगों से मुझे ऊब होती है। फिल्म के लोग मुझे खासतौर पर बोर करते हैं। मैं पेड़ों से बातें करना पसंद करता हूँ।

प्रीतीश  ः इसका मतलब आपको प्रकृति पसंद है ?

किशोर ः इसीलिए तो मैं खण्डवा जाना चाहता हूं। यहां मेरा प्रकृति से सभी सम्बन्ध खत्म हो गया है। मैंने अपने बंगले के चारो तरफ नहर खोदने की कोशिश की थी जिससे मैं उसमें गण्डोला चला सकूं। जब मेरे आदमी खुदाई कर रहे थे तो नगर महापालिका वाले बन्दे बैठे रहते थे, देखते थे और ना-ना में अपनी गर्दन हिलाते रहते थे। लेकिन यह काम नहीं आया। एक दिन किसी को एक हाथ का कंकाल मिला – एड़ियां मिलीं। उसके बाद कोई खुदाई करने को तैयार नहीं था। मेरा दूसरा भाई अनूप गंगाजल छिड़कने लगा, मंत्र पढ़ने लगा। उसने सोचा कि यह घर कब्रिस्तान पर बना है। हो सकता हो यह बना हो लेकिन मैंने अपने घर को वेनिस जैसा बनाने का मौका खो दिया।

प्रीतीश ः लोगों ने सोचा होगा कि आप पागल हैं ! दरअसल, लोग ऐसा ही सोचते हैं।

किशोर ः कौन कहता है मैं पागल हूं। दुनिया पागल है, मैं नहीं।

प्रीतीश ः आपकी छवि अजीबोगरीब काम करने वाले व्यक्ति की क्यों है ?

किशोर ः यह सब तब शुरू हुआ जब वह लड़की मेरा इंटरव्यु लेने आई। उन दिनों मैं अकेला रहता था। तो उसने कहा: आप जरूर बहुत अकेले होंगे। मैंने कहा नहीं, आओ मैं तुम्हें अपने कुछ दोस्तों से मिलवाता हूं। इसलिए मैं उसे अपने बगीचे में ले गया और अपने कुछ मित्र पेड़ों जनार्दन, रघुनंदन, गंगाधर, जगन्नाथ, बुधुराम, झटपटझटपट से मिलवाया। मैंने कहा, इस निर्दयी संसार में यही मेरे सबसे करीबी दोस्त हैं। उसने जाकर वह घटिया कहानी लिख दी कि मैं पेड़ों को अपनी बांहो में घेरकर शाम गुजरता हूं। आप ही बताइए इसमें गलत क्या है ? पेड़ों से दोस्ती करने में गलत क्या है ?

प्रीतीश ः कुछ नहीं।

किशोर कुमार, साहिर लुधियानवी, देव आनन्द, राहुल देव बर्मन एवं यश चोपड़ा (चित्र गूगल इमेज से)

किशोर कुमार, साहिर लुधियानवी, देव आनन्द, राहुल देव बर्मन एवं यश चोपड़ा (चित्र गूगल इमेज से)

किशोर ः फिर यह इंटीरियर डेकोरेटर आया था। सूटेड-बूटेड, तपती गर्मी में सैविले रो का ऊनी थ्री-पीस सूट पहने हुए मुझे सौंदर्य, डिजाइन, दृश्य क्षमता इत्यादि के बारे में लेक्चर दे रहा था। करीब आधे घण्टे तक उसके अजीब अमेरिकन लहजे वाली अंग्रेजी में उसे सुनने के बाद मैंने उससे कहा कि मुझे अपने सोने वाले कमरे के लिए बहुत साधारण सी चीज चाहिए। कुछ फीट गहरा पानी जिसमें बड़े सोफे की जगह चारों तरफ छोटी-छोटी नाव तैरें। मैंने कहा, सेंटर टेबल को बीच में अंकुश से बांध देंगे जिससे उस पर चाय रखी जा सके और हम सब उसके चारों तरफ अपनी-अपनी नाव में बैठकर अपनी चाय पी सकें।

मैंने कहा, लेकिन नाव का संतुलन सही होना चाहिए, नहीं तो हम लोग एक-दूसरे फुसफुसाते रह जाएंगे और बातचीत करना मुश्किल होगा। वह थोड़ा सावधान दिखने लगा लेकिन जब मैंने दीवारों की सजावट के बारे में बताना शुरू किया तो उसकी सावधानी गहरे भय में बदल गई।

मैंने उससे कहा कि मैं कलाकृतियों की जगह जीवित कौओं को दीवार पर टांगना चाहता हूं क्योंकि मुझे प्रकृति बहुत पसंद है। और पंखों की जगह हम ऊपर की दीवार पर पादते हुए बंदर लगा सकते हैं। उसी समय वह अपनी आंखों में विचित्र सा भाव लिए धीरे से खिसक लिया। आखिरी बार मैंने उसे तब देखा था जब वह बाहर के दरवाजे से ऐसी गति से भाग रहा था कि इलेक्ट्रिक ट्रेन शरमा जाए। तुम ही बताओ, ऐसा लीविंग रूम बनाना क्या पागलपन है ? अगर वह प्रचण्ड गर्मी में ऊनी थ्री पीस सूट पहन सकता है तो मैं अपनी दीवार पर कौअे क्यों नहीं टांग सकता ?

प्रीतीश ः आपके विचार काफी मौलिक हैं, लेकिन आपकी फिल्में पिट क्यों रही हैं ?

किशोर ः क्योंकि मैंने अपने वितरकों को उनकी अनदेखी करने को कहा है। मैंने उनसे शुरू ही में कह दिया कि फिल्म अधिक से अधिक एक हफ्ता चलेगी। जाहिर है कि वे भाग गए और कभी वापस नहीं आए। आप को ऐसा निर्माता-निर्देशक कहाँ मिलेगा जो खुद आपको सावधान करे कि उसकी फिल्म को हाथ मत लगाइए क्योंकि वह खुद भी नहीं समझ सकता कि उसने क्या बनाया है ?

प्रीतीश ः फिर आप फिल्म बनाते ही क्यों हैं ?

किशोर ः क्योंकि यह भावना मुझे प्रेरित करती है। मुझे लगता है कि मेरे पास कहने के लिए कुछ है और कई बार मेरी फिल्में अच्छा प्रदर्शन भी करती हैं। मुझे अपनी एक फिल्म- ’दूर गगन की छाँव में’ याद है, अलंकार हॉल में यह मात्र 10 दर्शकों के साथ शुरू हुई थी। मुझे पता है क्योंकि मैं खुद हॉल में था। पहला शो देखने सिर्फ दस लोग आए थे ! यह रिलीज भी विचित्र तरीके से हुई थी। मेरे बहनोई के भाई सुबोध मुखर्जी ने अपने फिल्म अप्रैल-फूल जिसके बारे सभी जानते थे कि वो ब्लॉक-बस्टर होने जा रही है, के लिए अलंकार हॉल को आठ हफ्तों के लिए बुक करवा लिया था।

मेरी फिल्म के बारे में सभी को विश्वास था कि वो बुरी तरह फ्लॉप होने वाली है। तो उन्होंने अपनी बुकिंग में से एक हफ्ता मुझे देने की पेशकश की। उन्होंने बड़े अंदाज से कहा कि, तुम एक हफ्ते ले लो, मैं सात ही काम चला लूंगा। आखिकार, फिल्म एक हफ्ते से ज्यादा चलने वाली है नहीं।

मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि यह दो दिन भी नहीं चलेगी। जब पहले शो में दस लोग भी नहीं आए तो उन्होंने मुझे दिलासा देते हुए कहा कि परेशान मत हो कई बार ऐसा होता है। लेकिन परेशान कौन था ? फिर, बात फैल गई। जंगल की आग की तरह। और कुछ ही दिनों में हॉल भरने लगा। यह अलंकार में पूरे आठ हफ्ते तक हाउस फुल चली !

सुबोध मुखर्जी मुझ पर चिल्लाते रहे लेकिन मैं हॉल को हाथ से कैसे जाने देता ? आठ हफ्ते बाद जब बुकिंग खत्म हो गई तो फिल्म सुपर हॉल में लगी और वहाँ फिर 21 हफ्तों तक चली ! ये मेरी हिट फिल्म का हाल है। कोई इसकी व्याख्या कैसे करेगा ? क्या आप इसकी व्याख्या कर सकते हैं ? क्या सुबोध मुखर्जी कर सकते हैं जिनकी अप्रैल-फूल बुरी तरह फ्लॉप हो गई ?

प्रीतीश ः लेकिन आपको, एक निर्देशक के तौर पर पता होना चाहिए था ?

किशोर ः निर्देशक कुछ नहीं जानते। मुझे अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का अवसर नहीं मिला। सत्येन बोस और बिमल रॉय के अलावा किसी को फिल्म निर्माण का कखगघ भी नहीं पता था। ऐसे निर्देशकों के साथ आप मुझसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कैसे कर सकते हैं ?

एस डी नारंग जैसे निर्देशकों को यह भी नहीं पता था कि कैमरा कहाँ रखें। वे सिगरेट का लम्बा अवसादभरा कश लेते, हर किसी से शांत, शांत, शांत रहने को कहते, बेख्याल से कुछ फर्लांग चलते, कुछ बड़बड़ाते और कैमरामैन से जहाँ वह चाहे वहाँ कैमरा रखने को कहते थे।

मेरे लिए उनकी खास लाइन थी: कुछ करो। क्या कुछ ? अरे, कुछ भी ! अतः मैं अपनी उछलकूद करने लगता था। क्या अभिनय का यही तरीका है ? क्या एक फिल्म निर्देशित करने का यही तरीका है ? और फिर भी नारंग साहब ने कई हिट फिल्में बनाईं !

प्रीतीश ः आपने अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का प्रस्ताव क्यों नहीं रखा ?

किशोर ः प्रस्ताव ! मैं बेहद डरा हुआ था। सत्यजित रॉय मेरे पास आए था और वह चाहते थे कि मैं उनकी प्रसिद्ध कामेडी पारस पत्थर में काम करूँ और मैं डरकर भाग गया था। बाद में तुलसी चक्रवर्ती ने वो रोल किया। ये बहुत अच्छा रोल था और इन महान निर्देशकों से इतना डरा हुआ था कि मैं भाग गया।

प्रीतीश ः लेकिन आप सत्यजीत रॉय को जानते थे।

किशोर ः निसंदेह, मैं जानता था। पाथेर पांचाली के वक्त जब वह घोर आर्थिक संकट में थे तब मैंने उन्हें पाँच हजार रुपए दिए थे। हालाँकि उन्होंने पूरा पैसा चुका दिया फिर भी मैंने कभी यह नहीं भूलने दिया कि मैंने उनकी क्लासिक फिल्म बनाने में मदद की थी। मैं अभी भी उन्हें इसे लेकर छेड़ता हूं। मैं उधार दिए हुए पैसे कभी नहीं भूलता !

प्रीतीश ः अच्छा, कुछ लोग सोचते हैं कि आप पैसे को लेकर पागल हैं। अन्य लोग आप को ऐसा जोकर कहते हैं, जो अजीबोगरीब होने का दिखावा करता है, लेकिन असल में बहुत ही चालाक है। कुछ और लोग आपको धूर्त और चालबाज आदमी मानते हैं। इनमें से आपकी का असली रूप कौन सा है ?

किशोर ः अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग समय में मैं अलग-अलग रोल निभाता हूँ। इस पागल दुनिया में केवल सच्चा समझदार आदमी ही पागल प्रतीत होता है। मुझे देखो, क्या मैं पागल लगता हूँ ? क्या तुम्हें लगता है कि मैं चालबाज हूँ ?

प्रीतीश ः मैं कैसे जान सकता हूँ ?

किशोर ः बिल्कुल जान सकते हो। किसी आदमी को देखकर उसे जाना जा सकता है। तुम इन फिल्मी लोगों को देखो और तुम इन्हें देखते ही जान लोगे कि ये ठग हैं।

प्रीतीश ः मैं ऐसा मानता हूँ।

किशोर ः मैं मानता नहीं,  मैं यह जानता हूँ। तुम उन पर धुर भर भरोसा नहीं कर सकते। मैं इस चूहादौड़ में इतने लम्बे समय से हूँ कि मैं मुसीबत को मीलों पहले सूँघ सकता हूँ। मैंने मुसीबत को उसी दिन सूँघ लिया था जिस दिन मैं एक पार्श्व गायक बनने की उम्मीद में बाम्बे आया लेकिन एक्टिंग में फंसा दिया गया था। मुझे तो पीठ दिखाकर भाग जाना चाहिए था।

प्रीतीश ः आप ने ऐसा क्यों नहीं किया ?

किशोर ः हालाँकि इसके लिए मैं उसी वक्त से पछता रहा हूँ। बूम बूम। बूम्प्टी बूम बूम चिकाचिकाचिक चिक चिक याडले ईईई याडले उउउउउ (जब तक चाय नहीं आ जाती याडलिंग करते हैं। कोई लिविंग रूम से उलटे हुए सोफे की ओर से आता है, थोड़ा दुखी दिख रहा है, उसके हाथ में चूहों द्वारा कुतरी हुई कुछ फाइलें हैं जो वो किशोर को दिखाने के लिए लिए हुए है। )

प्रीतीश ः ये कैसी फाइलें हैं ?

किशोर ः मेरा इनकमटैक्स रिकार्ड।

प्रीतीश ः चूहों से कुतरी हुई ?

किशोर ः हम इनका प्रयोग चूहे मारने वाली दवाइयों के रूप में करते हैं। ये काफी प्रभावी हैं। इन्हें काटने के बाद चूहे आसानी से मर जाते हैं।

प्रीतीश ः आप इनकम टैक्स वालों को क्या दिखाते हैं जब वो पेपर मांगते हैं ?

किशोर ः मरे हुए चूहे।

प्रीतीश ः समझा

किशोर ः तुम्हें मरे हुए चूहे पसंद हैं ?

प्रीतीश ः कुछ खास नहीं।

किशोर ः दुनिया के कुछ हिस्सों में लोग उन्हें खाते हैं।

प्रीतीश ः मुझे भी लगता है।

किशोर ः Haute cuisine. महँगा भी। बहुत पैसे लगते हैं।

प्रीतीश ः हाँ ?

किशोर ः चूहे, अच्छा धंधा हैं। किसी के पास व्यावसायिक बुद्धि हो तो वह उनसे बहुत से पैसे कमा सकता है।

प्रीतीश ः मुझे लगता है कि आप पैसे को लेकर बहुत ज्यादा हुज्जती हैं। मुझे किसी ने बताया कि एक निर्माता ने आपके आधे पैसे दिए था तो आप सेट पर आधा सिर और आधी मूँछ छिलवाकर पहुँचे थे। और आपने उससे कहा था कि जब वह बाकी पैसे दे देगा तभी आप पहले की तरह शूटिंग करेंगे।

किशोर ः वो मुझे हल्के में क्यों लेंगे ? ये लोग कभी पैसा नहीं चुकाते जब तक कि आप उन्हें सबक न सिखाएं। मुझे लगता है कि वह फिल्म मिस मैरी थी और ये बंदे होटल में पाँच दिन तक बिना शूंटिग किए मेरा इंतजार करते रहे। अतः मैं ऊब गया और अपने बाल काटने लगा।

पहले मैंने सिर के दाहिने तरफ के कुछ बाल काटे, फिर उसे बराबर करने के लिए बायें तरफ के कुछ बाल काटे। गलती से मैंने थोड़ा ज्यादा काट दिया। इसलिए फिर से दाहिने तरफ का कुछ बाल काटना पड़ा। फिर से मैंने ज्यादा काट दिया। तो मुझे बायें तरफ का फिर से काटना पड़ा। ये तब तक चलता रहा जब तक कि मेरे सिर पर कोई बाल नहीं बचा और उसी वक्त उन्होंने मुझे सेट पर बुलाया। मैं जब इस हालत में सेट पर पहुंचा तो सभी चक्कर खा गए।

इस तरह बाम्बे तक अफवाह पहुँची। उन्होंने कहा था कि मैं बौरा गया हूँ। मुझे ये सब नहीं पता था। जब मैं वापस आया तो देखा कि हर कोई मुझे दूर से बधाई दे रहा है और 10 फिट की दूरी से बात कर रहा है।

यहाँ तक कि जो लोग मुझसे गले मिला करते थे वो भी दूर से हाथ हिला रहे थे। फिर किसी ने थोड़ा झिझकते हुए मुझसे पूछा कि अब मैं कैसा महसूस कर रहा था। मैंने कहा, बढ़िया। मैंने शायद थोड़ा अटपटे ढंग से कहा था। अचानक मैंने देखा कि वो लौट कर भाग रहा है। मुझसे दूर, बहुत दूर।

प्रीतीश ः लेकिन क्या आप सचमुच पैसे को लेकर इतने हुज्जती हैं ?

किशोर ः मुझे टैक्स देना होता है।

प्रीतीश ः मुझे पता चला है कि आपको आयकर से जुड़ी समस्याएँ भी हैं।

किशोर ः कौन नहीं जानता ? मेरा मूल बकाया बहुत ज्यादा नहीं था लेकिन ब्याज बढ़ता गया। खण्डवा जाने से पहले बहुत सी चीजें बेचने का मेरा प्लान है और इस पूरे मामले को मैं हमेशा के लिए हल कर दूँगा।

प्रीतीश ः आपने आपातकाल के दौरान संजय गांधी के लिए गाने को मना कर दिया था और कहा जाता है कि, इसीलिए आयकर वाले आपके पीछे पड़े। क्या यह सच है ?

किशोर ः कौन जाने वो क्यों आए । लेकिन कोई भी मुझसे वो नहीं करा सकता जो मैं नहीं करना चाहता। मैं किसी और की इच्छा या हुकुम से नहीं गाता। लेकिन समाजसेवा के लिए मैं हमेशा ही गाता हूँ।

प्रीतीश ः आपके घरेलू जीवन के बारे में क्या ? इतनी परेशानियाँ क्यों ?

किशोर ः क्योंकि मैं अकेला छोड़े जाना पसंद करता हूँ।

प्रीतीश ः आपकी पहली पत्नी, रुमा देवी के संग क्या समस्या हुई ?

किशोर ः वो बहुत ही प्रतिभाशाली महिला थीं लेकिन हम साथ नही रह सके क्योंकि हम जिंदगी को अलग-अलग नजरिए से देखते थे। वो एक क्वॉयर और कॅरियर बनाना चाहती थी। मैं चाहता था कि कोई मेरे घर की देखभाग करे। दोनों की पटरी कैसे बैठती ?

देखो, मैं एक साधारण दिमाग गाँव वाले जैसा हूँ। मैं औरतों के करियर बनाने वाली बात समझ नहीं पाता। बीबीयों को पहले घर सँवारना सीखना चाहिए। और आप दोनों काम कैसे कर सकते हैं ? करियर और घर दो भिन्न चीजें हैं। इसीलिए हम दोनों अपने-अपने अलग रास्तों पर चल पड़े।

प्रीतीश ः आपकी दूसरी बीबी, मधुबाला ?

किशोर ः वह मामला थोड़ा अलग था। उससे शादी करने से पहले ही मैं जानता था कि वो काफी बीमार है। लेकिन कसम तो कसम होती है। अतः मैंने अपनी बात रखी और उसे पत्नी के रूप में अपने घर ले आया, तब भी जब मैं जानता था कि वह हृदय की जन्मजात बीमारी से मर रही है। नौ सालों तक मैंने उसकी सेवा की। मैंने उसे अपनी आँखों के सामने मरते देखा। तुम इसे नहीं समझ सकते जब तक कि तुम इससे खुद न गुजरो। वह बेहद खूबसूरत महिला थी लेकिन उसकी मृत्यु बहुत दर्दनाक थी।

वह फ्रस्ट्रेशन में चिड़चिड़ाती और चिल्लाती थी। इतना चंचल व्यक्ति किस तरह नौ लम्बे सालों तक बिस्तर पर पड़ा रह सकता है। और मुझे हर वक्त उसे हँसाना होता था। मुझसे डाक्टर ने यही कहा था। उसकी आखिरी साँस तक मैं यही करता रहा। मैं उसके साथ हँसता था, उसके साथ रोता था।

प्रीतीश ः आपकी तीसरी शादी ? योगिता बाली के साथ ?

किशोर ः वह एक मजाक था। मुझे नहीं लगता कि वह शादी के बारे में गंभीर थी। वह बस अपनी माँ को लेकर आब्सेस्ड थी। वो यहाँ कभी नहीं रहना चाहती थी।

प्रीतीश ः लेकिन वो इसलिए कि वह कहती हैं कि आप रात भर जागते और पैसे गिनते थे।

किशोर ः क्या तुम्हें लगता है कि मैं ऐसा कर सकता हूँ ? क्या तुम्हें लगता है कि मैं पागल हूँ ? खैर, ये अच्छा हुआ कि हम जल्दी अलग हो गए।

प्रीतीश ः आपकी वर्तमान शादी ?

किशोर ः लीना अलग तरह की इंसान है। वह भी उन सभी की तरह अभिने़त्री है लेकिन वह बहुत अलग है। उसने त्रासदी देखी है। उसने दुख का सामना किया है। जब आपके पति को मार दिया जाए आप बदल जाते हैं। आप जिंदगी को समझने लगते हैं। आप चीजों की क्षणभंगुरता को महससू करने लगते हैं। अब मैं खुश हूँ।

प्रीतीश ः आपकी नई फिल्म ? क्या आप इसमें भी हीरो की भूमिका निभाने जा रहे हैं ?

किशोर ः नहीं, नहीं नहीं। मैं केवल निर्माता-निर्देशक हूँ। मैं कैमरे के पीछे ही रहुंगा। याद है, मैंने तुम्हें बताया था कि मैं एक्टिंग से कितनी नफरत करता हूँ ? अधिक से अधिक मैं यही कर सकता हूँ एकाध सेकेण्ड के लिए स्क्रीन पर किसी बूढ़े आदमी या कुछ और बनकर दिखाई दूँ।

प्रीतीश ः हिचकाक की तरह ?

किशोर ः हाँ, मेरे पसंदीदा निर्देशक। मैं दिवाना हूँ लेकिन सिर्फ एक चीज का। हाॅरर फिल्मों का। मुझे भूत पसंद हैं। वो डरावने मित्रवत लोग होते हैं। अगर तुम्हें उन्हें जानने का मौका मिले तो वास्तव में बहुत ही अच्छे लोग। फिल्मी दुनिया वालों की तरह नहीं। क्या तुम किसी भूत को जानते हो ?

प्रीतीश ः बहुत दोस्ताना वाले नहीं।

किशोर ः लेकिन अच्छे, डरावने वाले ?

प्रीतीश ः दरअसल नहीं।

किशोर ः लेकिन हमलोग एक दिन ऐसे ही होने वाले हैं। इसकी तरह (एक कंकाल की तरफ इशारा करते हैं जिसे वो सजावट की तरह प्रयोग करते हैं। कंकाल की आँखो से लाल प्रकाश निकलता है) – तुम यह भी नहीं जानते कि यह आदमी है या औरत। लेकिन यह अच्छा है। दोस्ताना भी। देखो, अपनी गायब नाक पर मेरा चश्मा लगा कर ये ज्यादा अच्छा नहीं लगता ?

प्रीतीश ः सचमुच, बहुत अच्छा।

किशोर ः तुम एक अच्छे आदमी हो। तुम जिंदगी की असलियत को समझते हो। तुम एक दिन ऐसे ही दिखोगे।

अनुवाद – रंगनाथ सिंह

यह साक्षात्कार अहा ज़िन्दगी  के जून, 2013 अंक में प्रकाशित हो चुका है.

सत्यजित रे – कलकत्ता त्रयी के बहाने एक बातचीत

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सत्यजित रे के सिने जगत में अगर ‘अपु त्रयी’ का स्थान सबसे ऊपर है तो 1970 के दशक की शुरुआत में ‘कलकत्ता त्रयी’ ने उनकी राजनीतिक विचारधाराओं को स्पष्ट किया था। यह समय नक्सलवादी हिंसा का था और अनेक फिल्मकार और अन्य रचनाकार अपने-अपने तरीके से तत्कालीन राजनीतिक उथल-पुथल के सिरे पकड़ने का प्रयास कर रहे थे।

सत्यजित रे पर भी यूँ  उनके समकालीनों द्वारा राजनीतिक तौर पर ‘प्रतिबद्धता’ न दर्शाने के आरोप लगते रहे थे, जिनका जवाब उन्होंने कलकत्ता त्रयी के माध्यम से बहुत ही सशक्त तरीके से दिया था। प्रस्तुत साक्षात्कार इसी त्रयी के निर्माण के दौरान दिया गया था जो पहली बार साइट एंड साउंड‘ 42, अंक-1 (1975) में प्रकाशित हुआ था।

उल्लेखनीय यह है कि 1975 आई उनकी फिल्म ‘जन अरण्य’ को कलकत्ता त्रयी का तीसरे स्तंभ के रूप में अपनाया गया था, परंतु इस साक्षात्कार में ‘अरण्येर दिनरात्रि’ को इस त्रयी के पहले स्तंभ के तौर पर माना गया है। दरअसल, जन अरण्य के बाद कलकत्ता त्रयी का स्वरूप पूर्ण होता है। परंतु यहां एक वृहद परिप्रेक्ष्य में अरण्येर दिनरात्रि को त्रयी के एक शुरुआती संकेतरूपी अंश के तौर पर अपनाया जा सकता है क्योंकि सत्यजित रे इस बहाने एक ऐसी फिल्म पर बात करते हैं, जिसे हमारे देश में बहुत कम समझा और जाना गया है।

कलकत्ता त्रयी की असली पहचान ‘प्रतिद्वंद्वी’, ‘सीमाबद्ध’, ‘जन अरण्य’ के रूप में ही है, जिनमें राजनीतिक हालात दर्शाते हुए भी, निजी मानवीय दृष्टिकोण की पुरजोर हिमायत करने वाले एक ईमानदार रचनाकार की आवाज पूरी गूँज के साथ सुनाई देती है। अपनी कुछ अन्य फिल्मों पर भी यहां सत्यजित रे बात करते हैं। पाठक देखेंगे कि इस साक्षात्कार में विमर्श के दौरान आए कई संदर्भ आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने चालीस वर्ष पहले थे।


क्रिस्टेन ब्राड थॉमसन : क्या आपने जान-बूझकर इस विचार के साथ शुरुआत की थी कि अरण्येर दिनरात्रि, प्रतिद्वंद्वी और सीमाबद्ध एक नई त्रयी के रूप में सामने आएगी ?

सत्यजित रे : मैंने पहली दो फिल्मों के निर्माण तक यह नहीं सोचा था। अरण्येर दिनरात्रि मैंने इसलिए बनाई क्योंकि मुझे कहानी पसंद आई थी, और प्रतिद्वंद्वी, वह मैंने इसलिए बनाई थी क्योंकि कलकत्ता में हालात बहुत तनावपूर्ण थे। विद्यार्थी बहुत सक्रिय थे और शहर में काफी हिंसा हो रही थी और यदि ऐसे में मैं एक और फिल्म बनाता तो उसे कलकत्ता शहर और उसके युवाओं पर ही होना चाहिए था। फिर 1971 में मैंने सीमाबद्ध उपन्यास पढ़ा और मुझे तभी लगा कि यह बहुत महत्वपूर्ण थीम है।

प्रतिद्वंद्वी में नौकरी की तलाश करते एक युवा को दिखाने के बाद यह जरूरी हो गया था कि मैं ऐसे लोगों को भी दिखाता जिनका नौकरियों पर कब्जा है, यानी नया उच्चवर्ग, वह वर्ग जो आजादी के बाद से अस्तित्व में आया है। आप जानते हैं कि एक तरह से ब्रिटिश ने बहुत ज्यादा…

थॉमसन : इस नई त्रयी से आपने एक राजनीतिक संचेतना भी प्राप्त की है जो इससे पहले आपकी फिल्मों में उतनी मुखर होकर नहीं आई थी।

सत्यजित रे : संभव है, लेकिन राजनीति खुद पिछले तीन या चार वर्षों में अधिकाधिक सतह पर आ चुकी है। आप इसे कलकत्ता के रोज के जनजीवन में देख सकते हैं: न केवल बम धमाके वगैरह, बल्कि लोगों से मिलना और सड़क पर चलते हुए दीवारों पर लगे पोस्टर्स आदि देखना।

मैं कभी राजनीति से अनजान नहीं रहा, लेकिन मैंने पहले राजनीतिक मुद्दों को अपनी फिल्मों में इसलिए नहीं दिखाया क्योंकि मेरे ख्याल से भारत में राजनीति एक बहुत अस्थिर चीज है। राजनीतिक दल बहुत जल्दी टूट जाते हैं और मेरा आज के वाम धड़े में उतना यकीन भी नहीं रहा। आज भारत में तीन कम्युनिस्ट पार्टियां हैं और मुझे इसका मतलब समझ नहीं आता।

थॉमसन  : भारत में तीनों फिल्मों को किस तरह लिया गया ?

सत्यजित रे : प्रतिद्वंद्वी से पहले मेरी गैर-राजनीतिक कहकर आलोचना की जाती थी। फिल्म के आने के बाद उन्हें लगा कि मैं राजनीतिक तौर पर प्रतिबद्ध हूं और फिल्म बहुत सफल रही थी।

प्रतिद्वंद्वी में एक क्रांतिकारी पात्र है, जिसकी मौजूदगी आम दर्शकों के लिए बहुत थी। उन्हें फिल्म की गहराई से मतलब नहीं, केवल इतना कि उसमें राजनीति का कुछ जिक्र है। परंतु मेरी पिछली फिल्म अरण्येर दिनरात्रि को भारत में नहीं समझा गया था। उसकी ऊपरी कथावस्तु के कारण वह उन्हें सतही नजर आई, और उसके कथानक में छिपे निहितार्थ वह नहीं समझे, जो मेरी राय में उसे मेरी सबसे अच्छी फिल्म बनाते हैं। वह सात प्रमुख चरित्रों वाली एक जटिल फिल्म है और उसका प्रारूप मुझे बहुत संतोषप्रद लगता है।

थॉमसन : मैं आपकी बात से इत्तेफाक रखता हूं कि वह आपकी सबसे अच्छी फिल्मों में से है। परंतु क्या उसमें एक स्पष्ट कहानी की कमी नहीं है जो उसे दर्शकों के लिए कठिन बनाती है ?

सत्यजित रे : यह फिल्म मूलतः संबंधों पर आधारित है जिसका ढांचा बहुत जटिल है। हमारे देश में लोग कहते रहे कि यह किस बारे में है, कहानी कहां है, थीम वगैरह ? जबकि समस्या यह है कि फिल्म बहुत सी चीजों के बारे में है। लोगों को केवल एक थीम चाहिए होता है, जिसका सिरा वह थाम सकें।

मैं यह फिल्म बनाने को इसलिए प्रेरित हुआ था क्योंकि लोगों को उनके रोजमर्रा के परिवेश से बाहर ले जाने का पक्ष अपने आप में बहुत रोचक होता है और किस तरह रोजाना के दोहराऊ हालात से बाहर उनके चरित्र नया रूप लेते हैं। कंचनजंघा भी इसी तरह की फिल्म है जिसे नहीं समझा गया था। यह भी बहुत जटिल है और मेरी नजर में एक बहुत खूबसूरत फिल्म है।

उसमें करीब आठ या नौ चरित्र हैं, छुट्टियों पर आया हुआ एक परिवार, जो एक दोपहर टहलने निकला है, और यह समय दो घंटे के करीब का है। परंतु उस दौरान बहुत कुछ होता है। दो बेटियां हैं, जिसमें से एक शादीशुदा है और उसकी अपने पति से काफी तनातनी चल रही है, बात तलाक तक जा पहुंची है, लेकिन वह केवल अपनी बच्ची के कारण इस रिश्ते में है।

छोटी बेटी को इन छुट्टियों में एक व्यक्ति मिला है जो उसे इसी रोज शादी का प्रस्ताव पेश करना चाहता है। वह एक एग्जीक्यूटिव है जिसका भविष्य उज्ज्वल है, परंतु उसके जीवन मूल्य लड़की के पसंद के नहीं हैं। पिता को उम्मीद है कि लड़की हां कह देगी, परंतु उसके परिवार में यह पहला मौका है जब कोई उसकी इच्छा के विरुद्ध जाता है। वहीं कलकत्ता का एक आम मध्यवर्गीय युवा है जो लड़की की सोच को भाता है, और वहां एक इशारा आता है कि दोनों का भविष्य में साथ हो सकता है।

एक छोटा भाई है जो रसिक मिजाज और पूरी तरह व्यर्थ चरित्र है, जिसका उन दो घंटों के दौरान एक लड़की से अलगाव होता है दूसरी भी उसे तुरंत ही मिल जाती है।

परंतु मुझे कंचनजंघा में छोटी बेटी और उसके नए दोस्त के चरित्र सबसे रुचिकर लगते हैं, जिसे एकबारगी महसूस होता है कि यदि वह लड़की के रईस पिता को खुश कर सके तो शायद उसे एक नौकरी मिल सकती है।

पिता, जिसकी पांच कंपनियां है, उसके साथ अतीत की बात करता है, अंग्रेजों के जमाने की बातें, उन बेवकूफ आतंकियों की जो जेल में बंद मर गए और वह आज सफल है, और वह लड़के को एक नौकरी की भी पेशकश करता है। लेकिन लड़का उस प्रस्ताव को ठुकरा देता है। वह लड़की को बताता है कि यदि ऐसा कलकत्ता की किसी इंटरव्यू के दौरान होता तो वह उसे अपना लेता, परंतु यहां पहाड़ और बर्फ के बीच उसे अपना कद बहुत ऊंचा लग रहा है। वह खुश है कि उसने ना कहा है। मेरे लिए कंचनजंघा अपनी सीमाओं से बाहर आ रहे लोगों की खोज है और इस राजनीतिक त्रयी का उचित पूर्वालाप है।

कंचनजंघा और अरण्येर दिनरात्रि के यही पक्ष मुझे पसंद है: लोगों को उनके रोजमर्रा के परिवेश से बाहर लाकर उनके आवरणों के पीछे के सच की खोज करना, यह जानना कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है। फिल्मों में पैसे और मूल्यों और सुरक्षा व अपने अनैतिक क्रियाकलापों के दम पर अपने सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति की पैरवी करने के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है।

थॉमसन : इस त्रयी के दूसरे भाग प्रतिद्वंद्वी पर कुछ यूरोपियन आलोचकों की ठंडी प्रतिक्रिया आई थी, जिनका कहना था कि स्टाइलिस्टिक पक्ष से यह कुछ झिझकती हुई और आपके पिछले कार्यों की अपेक्षा ढांचागत तौर पर अधूरी दिखती है। आपने बहुत से फ्लैशबैक्स, स्वप्न दृश्यों और नेगेटिव दृश्यों का इस्तेमाल किया है। स्टाइल में ऐसा परिवर्तन क्यों ?

सत्यजित रे : मैंने जो कुछ भी किया, सोच-समझ कर किया था। मेरा मानना है कि एक फिल्म के स्टाइल को उसके प्रमुख पात्र निर्धारित करते हैं, और विशेषकर इस फिल्म के मामले में, जहां आप उस युवा के साथ पूरी तरह जुड़ते हैं, यह और भी जरूरी हो जाता है।

वह एक झिझकता हुआ सा पात्र है, जिसमें कई अंदरूनी द्वंद्व और शक और समस्याएं हैं, और जब वह फिल्म का केंद्रीय पात्र है तो मैं अपने कथित ‘क्लासिकल’ स्टाइल में कहानी कह ही नहीं सकता था। स्क्रीनप्ले लिखते समय मैं यही सोचता रहा था कि यदि यह एक सीधी रेखा में और पारंपरिक स्टाइल में चला तो यह गलत हो सकता है। इसीलिए मैंने ऐसे स्टाइलिस्टिक पक्ष इस्तेमाल किए जो मेरे कार्य में नए थे।

उदाहरण के लिए फिल्म की शुरुआत युवा के पिता की मृत्यु से होती है, जिसे निगेटिव में दिखाया गया है, और ऐसा करने के कई कारण थे। उस सीन में ऐसे व्यक्ति की मृत्यु दिखाई गई है जिसे आप नहीं जानते, जो फिल्म का एक पात्र नहीं है।

यह एक पूर्णतया अवैयक्तिक मृत्यु दृश्य है, और मृत्यु को स्क्रीन पर दिखा पाना बहुत कठिन होता है। यदि उसे पॉजीटिव में दिखाया जाता तो सभी उसमें जीवन के अंश ढूंढ़ने का प्रयत्न करते क्योंकि वह मृत पात्र के साथ भावनात्मक तौर पर नहीं जुड़े थे। और ऐसा नहीं होना चाहिए था: थीम का दर्शकों के साथ उसी समय जुड़ना बहुत जरूरी होता है। इसलिए मैंने निगेटिव से शुरुआत की थी, और चूंकि मैंने इसे एक बार किया तो सोचा कि एक बार और क्यों नहीं। ड्रीम सीक्वेंस के लिए भी मुझे यह तरीका सटीक लगा; एक अन्य ऐसे सीक्वेंस में भी इस्तेमाल जो पॉजीटिव में भी उतना ही असरकारी लगता।

वह दृश्य है जब युवक का दोस्त उसे एक वेश्या के पास ले जाता है, जहां से वह घिन्न खाकर भाग निकलता है। एक दृश्य में जब वह वेश्या निर्वस्त्र होने लगती है और केवल अपनी ब्रा में है और सिगरेट जलाती है। आमतौर पर बंगाली लड़कियां पब्लिक में नहीं पीतीं, और भारत में दर्शक बहुत पारंपरिक किस्म के हैं, इसलिए इस असर को कम करने के लिए मैंने निगेटिव का इस्तेमाल किया था।

प्रतिद्वंद्वी के नायक की समस्या यह है कि उसके दिमाग में एक साथ बहुत सी चीजें चल रही हैं, और अपने दिल की बात साझा करने के लिए उसके पास कोई नहीं है। उदाहरण के लिए वह अपनी बहन के बॉस से मिलने जाता है और अचानक – ठांय-ठांय-ठांय – वहां वह रिवॉल्वर से बॉस को गोली मार देता है। और फिर आपको पता चलता है कि यह केवल उसके दिमाग में चल रहा था। दरअसल, वह वहां बहुत विनम्र और नर्वस दिखता है, तो मैं कैसे बता सकता था कि वह सचमुच बॉस को मारना ही चाहता था ? इसलिए इस काल्पनिक दृश्यावली के अलावा इसे नहीं बताया जा सकता था।

कुछ लोगों को मेरी फिल्मों में एक खास किस्म के क्लासिकल स्टाइल को देखने की आदत सी पड़ गई है, इसलिए मुझे मालूम था कि आलोचना होगी। यदि यह किसी नवोदित निर्देशक का काम होता तो आलोचक उसे हाथोंहाथ लेते। परंतु मुझे आलोचना की परवाह नहीं है, और संभवतः पांच या छह वर्ष बाद वह उसे पुनरावलोकन के तौर पर देखेंगे तो उन्हें फिल्म सही लगेगी। मैं इस स्टाइल के प्रति स्पष्ट होना चाहता था कि यह मेरी पहली पॉलिटिकल फिल्म है, मेरे पिछले कार्यों से सर्वथा भिन्न।

थॉमसन : इसके बावजूद, आपने एक ऐसे युवक पर फिल्म बनाई है जो समाज में अपने स्थान को लेकर संशय में है, जबकि उसका भाई, जो एक क्रांतिकारी है, वह पृष्ठभूमि में रहता है। यदि आप सचमुच एक राजनीतिक फिल्म बनाना चाहते थे, तो आपने उस युवक को क्रांतिकारी क्यों नहीं बनाया ?

सत्यजित रे : ऐसा इसलिए क्योंकि जो व्यक्ति पूरी तरह से राजनीतिक हो चुका है, वह मनोवैज्ञानिक तौर पर कम रोचक होता है। क्रांतिकारी हमेशा अपने ही बारे में नहीं सोचते रहते। मेरी रुचि ऐसे युवक में थी जिसकी राजनीतिक विचारधारा बहुत स्पष्ट नहीं है और उसे एक नौकरी की जरूरत है, फिर चाहे किसी भी पार्टी का शासन हो। वह अपने बारे में सोच रहा है और इसीलिए प्रताड़ित भी हो रहा है। इसके अलावा, वह अपने निजी स्तर पर एक विरोध करता है, जो मेरी नजर में बेहतरीन है क्योंकि वह अपने अंदर बहुत गहरे से आती है और किसी राजनीतिक विचारधारा का नतीजा नहीं है।

थॉमसन : सीमाबद्ध में भी पृष्ठभूमि में एक क्रांतिकारी पात्र है। असल में हम उसे कभी देख ही नहीं पाते, परंतु हमें पता चलता है कि वह नायक की साली का मित्र है, एक ऐसा पात्र जो जाहिर है कहानी में नैतिकता की धुरी है।

सत्यजित रे : हां, परंतु एक तरह से नायक की साली का वह पात्र एक त्रासद स्थिति में हैं, क्योंकि वह सफलता की तलाश में कलकत्ता आई है और यह देखने कि उसकी बड़ी बहन का अपने एग्जीक्यूटिव पति के साथ जीवन कैसा चल रहा है। जो उसे दिखता है उससे वह हताश तो होती है, परंतु वहीं दूसरी ओर उसे इस बात का भी यकीन नहीं है कि वह वापस जाकर अपने क्रांतिकारी मित्र से शादी कर सकती है या नहीं।

उसे अपने उस संबंध की गहराई का अंदाजा नहीं है। उसका जीजा उससे पूछता है कि उसने अपने उस पुरुष मित्र के बारे में उसे पहले क्यों नहीं बताया। जवाब में वह कहती है ‘यदि ऐसा कुछ होता तो मैं आपको बता देती।’ वह कलकत्ता इसलिए आई है क्योंकि वह अपनी किशोरावस्था से अपने जीजा को पसंद करती थी।

वह उससे छह-सात वर्षों से नहीं मिली है और अब चूंकि वह एक सफल व्यक्ति है, वह उसके हालात को जानना चाहती है कि क्या वह पूरी तरह बदल चुका है या अभी भी उसमें कुछ बुनियादी इनसानी गुण बाकी हैं।

वह देखना चाहती है कि उसके हालात में क्या एक साधारण इनसान की तरह रहा जा सकता है। इसलिए वह यहां आती है और पहले पहल सबकुछ ठीक लगता है। लेकिन उसके बाद फैक्टरी की समस्याएं शुरू होती हैं, और वह टूट जाता है। स्पष्ट है कि वह केवल अपनी सफलता के बारे में ही सोच सकता है, चाहे कुछ भी हो जाए उसका करियर आगे बढ़ता रहना चाहिए।

थॉमसन  : परंतु क्या इस लड़की के पात्र के जरिए, जिसका एक क्रांतिकारी से संबंध है, से आपकी मंशा फिल्म को सचमुच उस नैतिक राजनीतिक पक्ष देने की थी जो यहां दिखता है ?

सत्यजित रे : मेरी राय में उसके हालात भी कुछ ऐसे ही हैं जैसे कि प्रतिद्वंद्वी के नायक के हैं। वह उलझन में है, हालांकि फिल्म के अंत में वह शायद उसी क्रांतिकारी मित्र के पास चली जाएगी क्योंकि उसने अपने से विपरीत हालात के जीवन की झलक देख ली है। परंतु यह जरूरी था कि अपना फैसला करने से पहले वह इस जीवन को भी देखती। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि किसी समस्या पर कोई फैसला लेने से पहले आपको उसके दोनों पक्षों का अंदाजा होना चाहिए। उसके बाद ही आप कोई सख्त फैसला ले सकते हैं जो, जैसे कि प्रतिद्वंद्वी में दिखता है, किसी विचारधारा पर आधारित फैसला नहीं होता, परंतु वह मूलतः आपके अपने मानवीय अनुभव के आधार पर लिया जाता है।

थॉमसन : यह आपकी राजनीतिक फिल्मों का एक अन्य रोचक पहलू कि वह…

सत्यजित रे : …कि वह गोदार या ग्लॉबेर रोशा और अन्य की फिल्मों जैसे नहीं दिखते ? नहीं, बिल्कुल नहीं, क्योंकि मैं व्यक्ति और उसके निजी विचारों में किसी भी वृहद राजनीतिक विचारधारा से अधिक विश्वास रखता हूं। ऐसी विचारधाराएं हमेशा वक्त के साथ बदलती रहती हैं।

थॉमसन : राजनीतिक धरातल पर आपकी फिल्में एग्जीक्यूटिव वर्ग का कड़ी आलोचना करती हैं, परंतु फिल्मों के लिए यह जरूरी होता है कि आप उस वर्ग के सदस्यों की मानवीय परख भी करें।

सत्यजित रे : बेशक। यहां तक कि ब्रिटिश काल में भी ऐसा ही था, क्योंकि भारत का बौद्धिक मध्यवर्ग ब्रिटिश शासन की ही उपज रहा था। उपनिवेशवाद और ब्रिटिश शिक्षा के बिना सशस्त्र क्रांति नहीं होती। अंग्रेजों ने बंगालियों को उदारवादी शिक्षा दी थी, जिस कारण अंततः वह क्रांतिकारियों के रूप में तब्दील हुए। और यह एक तरह की त्रासदपूर्ण स्थिति ही थी कि अंग्रेजों ने अपने दुश्मन खुद बना लिए थे। वह भी करीब सौ वर्ष पहले और उसके विकास की प्रक्रिया को ‘चारुलता’ में दर्शाया गया है, जहां वह समाचार पत्रों के जरिए अंग्रेजी शासन पर सवाल उठाते हैं। और बीसवीं सदी की शुरुआत में आपको ब्रिटिश के खिलाफ पहला सशस्त्र आंदोलन भी दिखता है। उसे किसानों या मजदूर वर्ग का सहयोग नहीं था। वह एक छोटा सा बौद्धिकों का समूह था, जिनके लीडर गैरीबाल्डी और अन्य का क्रांतिकारी साहित्य पढ़ते थे। वह अंग्रेजों से छुटकारा चाहते थे, इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न उन पर बम फेंके जाएं ? उससे हालांकि कुछ हासिल नहीं हुआ, और वह केवल एक संवेदनशील प्रक्रिया थी। परंतु ऐसी संवेदनशील प्रक्रियाएं मुझे अन्य विचारधारात्मक प्रक्रियाओं से अधिक रोमांचित करती हैं।

थॉमसन : सीमाबद्ध में आप यह कितनी गहराई तक बता रहे हैं कि उसका प्रमुख पात्र खुद बुरा होने की बजाय, अपने गलत हालात का शिकार है ?

सत्यजित रे : यह सिस्टम ही है जिसने उसे वैसा बनाया है। वह एक नौकरशाही और व्यावसायिक व्यवस्था का हिस्सा है, जहां निजता के लिए कोई स्थान नहीं। यदि आप समाज में रहना चाहते हैं तो जल्दी ही उसके ढांचे का हिस्सा बन जाते हैं, और वह आपको एक ऐसे रूप में बदल देता है जो आप शुरुआत में नहीं थे। इस व्यक्ति के साफतौर पर दो पक्ष हैं: उसकी अपनी निजी भावनाएं और आत्मा है, परंतु सिस्टम उसे उन्हें एक ओर रखने को कहता है और चाहता है कि वह केवल समाज और विकास के लिए सोचे। परंतु यह एक खुले विचारों वाली फिल्म है और कोई अंतिम वक्तव्य नहीं देती।

थॉमसन : इसके बावजूद, यदि आपको कोई अंतिम वक्तव्य देना हो कि लोगों को विखंडित कर देने वाले सिस्टम को कैसे तोड़ा जाए, तो आपका निष्कर्ष क्या होगा ? वैसे आपका क्रांतिकारी व्यवस्था में अधिक विश्वास नहीं रहा है।

सत्यजित रे : मैं माओ की क्रांति को समझ सकता हूं, जिसने चीन में संपूर्ण परिवर्तन किया था और एक खास कीमत चुकाकर – गरीबी और अशिक्षा का उन्मूलन किया था। परंतु मुझे नहीं लगता कि चीन जैसे स्थान में मेरे लिए कोई जगह है, क्योंकि मैं वैयक्तिक अभिव्यक्ति में गहराई से विश्वास रखता हूं। अपने अनुभव से मैंने जाना है कि कला एक कलात्मक व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होती है और मेरा उन कुछ नई थ्योरीज में कोई यकीन नहीं जो कहती हैं कि कला को नष्ट कर देना चाहिए और उसका स्थायी होना जरूरी नहीं है।

मैं स्थायी मूल्यों में विश्वास रखता हूं। यही मेरी संपूर्ण बौद्धिक बुनावट है और मुझे इस बारे में अपने आप से पूरी तरह ईमानदार रहना होगा। इसका यह मतलब भी नहीं कि मुझे युवाओं से हमदर्दी नहीं है, परंतु साथ ही यह भी दिखता है कि जब लोग एक खास आयुवर्ग को पार कर जाते हैं तो उनके अपने शक बढ़ते जाते हैं। यदि अठारह से पच्चीस वर्ष की आयु तक आप कुछ अतिवादिता के शिकार होते हैं, तो ठीक है। यदि नहीं, तो उम्र बढ़ने के साथ-साथ आपका मोहभंग होता जाता है।

थॉमसन : क्या आपकी पृष्ठभूमि भी यही रईस, उच्चवर्गीय है जिसे आपने कलकत्ता त्रयी में दिखाया और उसकी आलोचना की है ?

सत्यजित रे : नहीं, मैंने हमेशा इस तरह के वर्ग से दूरी बनाकर रखी है। मैं एक ऑब्जर्वर की भूमिका में रहा हूँ, बहुत ही एकांतवासी। जो लोग मेरी फिल्मों में मेरे साथ काम करते हैं, मेरे नजदीक हैं, परंतु मैं ऐसे किसी समूह का हिस्सा नहीं रहा हूं, जिन्हें मैंने पर्दे पर दिखाया है। फिल्में बनाने से पहले जब मैं एडवरटाइजिंग के क्षेत्र में था, तो उस समय मेरे कुछ मित्र थे जो राजनीतिक तौर पर बहुत सक्रिय थे और सोवियत यूनियन के हिमायती थे, परंतु बाद के वर्षों में मैंने देखा कि वह अब एडवरटाइजिंग फर्मों में बड़े ओहदों पर हैं।

वह 1940 के दशक के अपने राजनीतिक रुझान पर बात नहीं करते, और यदि करते भी हैं तो इस सिस्टम में अपने करियर के विकास को सही ठहराते हुए। मैं बतौर एक कलाकार सक्रिय था, जो मेरे लिए काफी है, हालांकि लोग कहते हैं कि मैं प्रतिबद्ध नहीं हूं। प्रतिबद्धता किसके साथ ? मैं अपने वक्तव्य देने के लिए इनसानों के लिए खुद को प्रतिबद्ध मानता हूं, और मेरी समझ में इतनी प्रतिबद्धता अपने आप में काफी है।

थॉमसन  : सीमाबद्ध में जिस बम धमाके की खबर सुनी जाती है, क्या वह कोई वामपंथी समूह करता है?

सत्यजित रे : हां, और दुख यही है कि अक्सर यह वाम विरुद्ध वाम हो जाता है। त्रासदी यह है कि वाम बहुत से समूहों में तब्दील हो गया है और वह अपने आप में ही एक दूसरे के दुश्मन बन गए हैं। वह उदारवादियों और पुरातनपंथियों से नहीं लड़ते। वह असली निशानों पर हमला नहीं करते, जैसे कि बड़े पूंजीपतियों पर, क्योंकि उन्हें हारने का डर होता है। इसके विपरीत, वह एक दूसरे पर हमले करते हैं।

थॉमसन : आपने  ग्लॉबेर रोशा के सिनेमा का जिक्र किया, जिसे आमतौर पर सिनेपर्दे पर तीसरी दुनिया की राजनीतिक अभिव्यक्ति कहा जाता है। आप उनकी फिल्मों के बारे में क्या सोचते हैं ?

सत्यजित रे : मैंने अभी तक उनकी कोई फिल्म नहीं देखी क्योंकि वह हमारे देश में नहीं दिखाई गई हैं। लेकिन मैं उन्हें जरूर देखना चाहूंगा, क्योंकि मुझे लगता है कि वह बहुत सशक्त और मुखर हैं। दि यंग ब्लड ऑफ सिनेमा। गुड!

अनुवाद  ःसंदीप मुद्गल
*इस लेख के प्रकाशन के लिए अनुवादक की सहमति आवश्यक है.

हरिश्‍चन्‍द्र पत्रिका – पहला पन्ना

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भारतेंदू हरिश्‍चन्‍द्र आधुनिक हिन्दी के उन्नायक माने जाते हैं. हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार के लिए भारतेंदू  ने 1873 में हरिश्‍चन्‍द्र पत्रिका नाम की एक पत्रिका शुरू की थी.

भारतेंदू की स्मृति एवं ध्येय को समर्पित करते हुए हमने इस ब्लॉग का नाम उन्हीं की पत्रिका के नाम पर रखा है.

इस ब्लॉग पर मौलिक एवं अनुवादित गद्य प्रस्तुत किया जाएगा.

सस्नेह

रंगनाथ सिंह